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पंजाब में ‘सतलुज’ को लेकर मचे बवाल पर क्यों खामोश हैं CM भगवंत मान?

Sutlej movie controversy Punjab: दलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को OTT से हटाए जाने के बाद पंजाब का सियासी पारा चढ़ गया है। कांग्रेस, बीजेपी और AAP जहां फिल्म के पक्ष में हैं, वहीं मुख्यमंत्री भगवंत मान की 10 दिनों की गैर-मौजूदगी और इस मुद्दे पर उनकी रहस्यमयी खामोशी चर्चा का विषय बनी हुई है।
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Sutlej movie controversy Punjab

OTT से हटी 'सतलुज', CM मान की खामोशी बनी चर्चा का विषय ।


Satluj movie controversy Punjab: ‘सतलुज’ फिल्म को लेकर पंजाब में सियासी पारा चढ़ा हुआ है, लेकिन मुख्यमंत्री भगवंत मान पूरी तरह खामोश हैं। अब तक उन्होंने इस मुद्दे पर एक भी शब्द नहीं कहा है, बल्कि वह पिछले 10 दिनों से पंजाब से बाहर हैं। 3 जुलाई को दलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई और अगले 48 घंटे में उसे हटा दिया गया। इसके बाद से पंजाब में राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। कांग्रेस और पंजाब बीजेपी के कुछ नेता फिल्म हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) भी फिल्म दिखाए जाने के पक्ष में है। लेकिन सीएम भगवंत मान इस मुद्दे पर खामोश हैं और उनकी ये खामोशी चर्चा का विषय बनी हुई है।

10 दिन पंजाब से रहे बाहर

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने खुद को इस विवाद से दूर रखा हुआ है। वे पिछले 10 दिनों से राज्य से बाहर हैं, इसलिए इस मामले से निपटने और विपक्ष के सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी उन्होंने पार्टी पर डाल दी है। CM मान 2 जुलाई को बेंगलुरु के एक प्राइवेट वेलनेस सेंटर में भर्ती होने के लिए गए थे। 3 जुलाई को फिल्म ZEE5 पर रिलीज हुई और 5 जुलाई को उसे OTT से हटा दिया गया। इसके बाद से कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और BJP जैसी विपक्षी पार्टियों के बीच सतलुज बहस का मुद्दा बनी हुई है। हालांकि, पंजाब के इतिहास में दर्ज एक काले अध्याय को दिखाने वाली इस फिल्म पर पंजाब के मुख्यमंत्री की खामोशी विपक्ष को पसंद नहीं आ रही है।

विपक्षी हमलों पर भी चुप्पी

‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। ऐसा माना जा रहा है कि ये फिल्म इस साल के आखिरी या 2027 के शुरू में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव पर बड़ा प्रभाव छोड़ सकती है, सभी दल बहुत सोच-समझकर इस पर बोल रहे हैं। खासकर, भाजपा सतलुज को लेकर बैलेंस साधने में लगी है। जहां उसकी पंजाब इकाई फिल्म को दिखाए जाने के पक्ष में है। वहीं, दिल्ली में बैठे कुछ नेताओं को इस पर ऐतराज है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने तो फिल्म पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। वहीं, आम आदमी पार्टी नेता फिल्म के प्रति समर्थन दिखा रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री खामोश हैं। CM ने न तो इस विवाद पर कोई टिप्पणी की है और न ही अकाली दल जैसी पार्टियों के राजनीतिक हमलों का कोई जवाब दिया है।

पंजाब से बाहर रहने के दौरान भगवंत मान ने वीडियो मैसेज के जरिए केवल एक बाद जनता को संबोधित किया है। उन्होंने लोगों से चुनाव आयोग (EC) द्वारा चलाई जा रही वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) प्रक्रिया में भाग लेने की अपील की है। यानी पंजाब में मौजूदा राजनीतिक चर्चा भले ही 'सतलुज' के इर्द-गिर्द घूम रही हो, लेकिन मान ने अपना ध्यान वोटर एनरोलमेंट और अपनी सरकार के मुख्य कल्याणकारी कार्यक्रम पर ही केंद्रित रखा है।

बेवजह तूल क्यों देना?

AAP ने सतलुज के संभावित राजनीतिक असर का आकलन किया है। खासकर इसलिए क्योंकि यह फिल्म पंजाब में उग्रवाद के दौर की याद दिलाती है। पार्टी नेताओं ने इस पर भी अच्छे से विचार-विमर्श किया है कि क्या उग्रवाद पर फिर से ध्यान केंद्रित करने से अकाली दल (वारिस पंजाब दे) को राजनीतिक फायदा मिल सकता है? खडूर साहिब से पार्टी के सांसद अमृतपाल सिंह 2023 से नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं। AAP के कुछ नेताओं का कहना है कि इस फिल्म से पार्टी को कोई बड़ा राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना कम है। इसलिए बेवजह मुद्दे को तूल देने से कोई मतलब नहीं।

पब्लिक स्क्रीनिंग का विरोध नहीं

नाम न छापने की शर्त पर आप के एक लीडर का कहना है कि पार्टी ने इस मुद्दे को बड़ा न बनाने का फैसला लिया है। हम फिल्म का विरोध नहीं करते, लेकिन हम बेवजह इस पर चर्चा भी नहीं चाहते। ऐसे सीएम की प्रतिक्रिया का मतलब होगा, मुद्दे का बड़ा बनना। मुख्यमंत्री मान के बजाए AAP संगठन और सरकार के अन्य पदाधिकारी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार 'सतलुज' की प्राइवेट स्क्रीनिंग का विरोध नहीं करेगी और फिल्म के प्रदर्शन पर फैसला केंद्र सरकार को करना है।

हत्यारा डीएसपी फरार?

सतलुज पर पंजाब के मुख्यमंत्री की खामोशी की एक बड़ी वजह ये भी है कि उन पर पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह समय से पहले रिहाई के आरोप भी लग रहे हैं। जसपाल, मानवाधिकार कार्यकर्ता खालड़ा के 1995 में अपहरण और हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। 2023 में उसे अंतरिम जमानत मिली और उसके बाद से उसका कोई पता नहीं है। जेल के रिकॉर्ड में उसने जो पता लिखवाया था, वहां वो पुलिस को नहीं मिला। हालांकि, मान सरकार सभी आरोपों से इनकार कर रही है। मान के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) बलतेज पन्नू ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि मान सरकार ने दोषियों की रिहाई से जुड़ी किसी भी फाइल पर साइन नहीं किए थे। उन्होंने एक तरह से इसकी जिम्मेदारी पिछली सरकारों पर डालने की कोशिश की। AAP सरकार का यह भी कहना है कि ऐसे मामलों में सजा में छूट तय कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के तहत दी गई।


भगवंत मान अच्छे से समझते हैं कि फिल्म पर कुछ भी बोलने का मतलब होगा, मामले को बड़ा बनाना और विपक्ष के आरोप लगाने के नए मौके देना इसलिए वह खामोश हैं। वह लोगों का ध्यान अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर केंद्रित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

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