
रिकॉर्ड गर्मी, बिगड़ता मौसम चक्र को लेकर चेतावनी देती धरती। (Photo- NASA @X)
Climate crisis impact: कल्पना कीजिए, एक ऐसा डॉक्टर जो सालों से चेतावनी दे रहा हो- सावधान हो जाइए, बीमारी बढ़ रही है! लेकिन मरीज हर बार मुस्कुराकर कह दे-अभी नहीं, बाद में देखेंगे। आज हमारी धरती भी कुछ ऐसी ही स्थिति में है। वह बोल नहीं सकती, लेकिन कभी तपती दोपहर में रिकॉर्ड तोड़ती लू बनकर, कभी कुछ घंटों में महीनों की बारिश बरसाकर, कभी सूखे से फटती धरती की दरारों में, तो कभी बाढ़ में डूबते शहरों की चीखों में चेतावनी दी रही है…। प्रकृति लगातार हमें संकेत दे रही है कि कुछ ठीक नहीं है। लेकिन हम हर बार यह सोचकर आगे बढ़ जाते हैं कि ऐसा तो हर साल होता है।
सच यह है कि अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा। 1901 के बाद से देश का औसत तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं 75 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। 2024 में दुनिया ने 58 अरब टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रिकॉर्ड बना दिया। ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के भविष्य पर लिखी जा रही चेतावनियां हैं।
आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस वर्ष की थीम है—प्रकृति से प्रेरित… जलवायु के लिए… हमारे भविष्य के लिए। यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक आईना है। ऐसा आईना, जिसमें हमें अपनी जीवनशैली, आदतों और जिम्मेदारियों को देखने की जरूरत है। क्योंकि पर्यावरण को बचाना केवल पेड़ लगाने का अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों को सांस लेने लायक दुनिया सौंपने का संकल्प है। धरती अभी भी हमें मौका दे रही है। सवाल यह नहीं कि प्रकृति कितने संकेत दे रही है, सवाल यह है कि हम उन्हें कब सुनेंगे।
लू अब केवल राजस्थान या उत्तर प्रदेश की समस्या नहीं, तटीय शहरों तक पहुंच चुकी है। डरावनी बात यह है कि अब रातें भी ठंडी नहीं होतीं और शरीर को राहत का वह एकमात्र वक्त भी छिन रहा है। वहीं जिन इलाकों को कभी सूखाग्रस्त कहा जाता था, वहां भी अब आसमान फट पड़ता है। सूखा अब धीरे-धीरे नहीं, अचानक पड़ता है। मानसून के बीच हफ्तों तक बारिश गायब हो जाती है और किसान आसमान ताकता रह जाता है। मानसून कभी देर से आता है, कभी पूरे सीजन की बारिश चंद दिन में उड़ेल देता है।
2025 में भारत में साल के 99 प्रतिशत दिन कोई न कोई चरम मौसमी घटना
2025 में बदलते मौसम से 1.74 करोड़ हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई।
135 जिलों में भूजल 40 मीटर से भी गहरे से निकाला जा रहा है।
7 वर्ष में ई-कचरा 147त्न और प्लास्टिक वेस्ट 41.4 लाख टन पहुंचा।
2024 में बाढ़-तूफान से 54 लाख लोग बेघर हुए।
गांव में: अनिश्चित बारिश से फसल चौपट.. भूजल गहरा… पशु बीमार.. आमदनी पर गहरी चोट
शहर में: 47 डिग्री तापमान पर बिजली कट..एक घंटे की बारिश में सब ठप.. एक्यूआइ 400 पार…
1-वर्षा जल संचयन को घर- घर की आदत बनाना होगा।
2-तालाब-पारंपरिक जलस्रोत पुनर्जीवित करने होंगे।
3-स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाने होंगे।
4-प्लास्टिक से नाता तोडऩा होगा।
5-ऊर्जा और पानी की बचत को जीवनशैली बनाना होगा।
पद्मभूषण से सम्मानित पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश जोशी ने कहा, जैसे उत्पादों पर कैलोरी और एक्सपायरी डेट लिखी जाती है, वैसे ही कार्बन फुटप्रिंट का उल्लेख भी होना चाहिए। इससे लोग जागरूक विकल्प चुन सकेंगे। चरम मौसमी घटनाएं चेता रही हैं कि प्रकृति के बैंक से केवल लेते रहने की बजाय उसमें जमा भी करने की भागीदारी निभानी होगी।
Updated on:
5 Jun 2026, 5:32 AM IST
Published on:
5 Jun 2026, 4:58 AM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.