
भारतीय किसान (प्रतीकात्मक तस्वीर- ANI)
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले सीमांत किसानों में से केवल एक चौथाई ही सहकारी संस्थाओं से जुड़े हैं, जबकि देश के कुल कृषि परिवारों में इनकी हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है। किसान दिवस पर जारी 'स्टेट ऑफ मार्जिनल फार्मर्स इन इंडिया 2025' रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
इस रिपोर्ट में छह राज्यों का अध्ययन किया गया - आंध्र प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और उत्तराखंड। प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (पीएसीएस) गांवों में किसानों के लिए ऋण, कृषि सामग्री, खरीद और डिजिटल सेवाओं का पहला माध्यम होती हैं। लेकिन जटिल प्रक्रियाएं, कार्यालयों की दूरी, पूंजी की कमी और सामाजिक भेदभाव ने किसानों को इनसे दूर रखा। बिहार, त्रिपुरा और हिमाचल में भागीदारी सबसे कम रही।
सहकारिता से जुड़े 45 फीसदी किसानों की घरेलू आय बढ़ी। आजीविका सुरक्षा में करीब 50 प्रतिशत सदस्यों ने सुधार महसूस किया और दो-तिहाई को ऋण मिला। फसल उत्पादन में 42 फीसदी किसानों ने बढ़ोतरी दर्ज की। कई राज्यों में पीएसीएस अब कर्ज से आगे बढ़कर ग्रामीण सेवा केंद्र बन रहे हैं और कृषि सामग्री, खरीद-विपणन, राशन वितरण और डिजिटल सेवाएं मुहैया करा रहे हैं।
त्रिपुरा में 77.8 फीसदी और बिहार में 25 फीसदी सहकारी समितियों ने किसी डिजिटल उपकरण का इस्तेमाल नहीं किया। महिलाओं और वृद्ध किसानों में डिजिटल कौशल की कमी ने लाभ सीमित रखे। नेतृत्व में भी भारी असमानता है। सामाजिक बंदिशें और घरेलू जिम्मेदारियां महिलाओं को नेतृत्व से दूर रखती हैं।
रिपोर्ट में सहकारी संस्थाओं को प्रभावी बनाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। जागरूकता अभियानों को तेज करना, सदस्यता की प्रक्रिया सरल बनाना, बुनियादी ढांचे में सुधार और बाजार से बेहतर संपर्क जरूरी बताया गया है। डिजिटल साक्षरता के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया गया है।
Published on:
26 Dec 2025 07:02 am
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