
Iran Oil Imports to India (AI Image)
Iran Oil Imports to India: करीब 7 साल के लंबे अंतराल के बाद ईरानी कच्चे तेल से भरे टैंकर भारतीय तटों पर पहुंचे हैं। यह सिर्फ एक व्यापारिक घटना नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन को लेकर बड़ा संकेत है। मिडिल ईस्ट में तनाव जारी है, जिसके चलते वैश्विक सप्लाई बाधित हुई है और अमेरिका की अस्थायी छूट के बीच भारत ने ईरान से फिर से तेल आयात करना शुरू किया है। गुजरात के सिक्का और ओडिशा के पारादीप के पास लंगर डाले टैंकर इस बात के प्रतीक हैं कि भारत ने एक बार फिर अपने 'राष्ट्रीय हित' को प्राथमिकता दी है।
भारत ने मई 2019 के बाद पहली बार ईरान से कच्चा तेल मंगवाया है। उस समय अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण आयात पूरी तरह बंद हो गया था। अब दो बड़े टैंकर फेलिसिटी और जया भारतीय जलक्षेत्र में पहुंचे हैं। फेलिसिटी ने गुजरात के सिक्का बंदरगाह के पास लंगर डाला है, जबकि जया ओडिशा के पारादीप पोर्ट के पास पहुंचा है। दोनों टैंकरों में करीब 20-20 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल होने का अनुमान है।
फेलिसिटी एक ईरान-ध्वज वाला बहुत बड़ा क्रूड कैरियर (वीएलसीसी) है, जिसे नेशनल ईरानियन टैंकर कंपनी संचालित करती है। यह टैंकर मार्च के मध्य में ईरान के प्रमुख निर्यात टर्मिनल खार्ग द्वीप से तेल लेकर निकला था। वहीं जया, जो कुराकाओ-ध्वज के तहत पंजीकृत है, फरवरी के अंत में खार्ग द्वीप से रवाना हुआ था, ठीक उस समय जब क्षेत्र में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव चरम पर था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, फेलिसिटी का तेल निजी क्षेत्र की दिग्गज रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए हो सकता है, जबकि जया की खेप इंडियन आयल कारपोरेशन के लिए मानी जा रही है।
21 मार्च को अमेरिका ने एक महीने की सीमित छूट दी, जिसके तहत उन टैंकरों को तेल बेचने की अनुमति मिली जो पहले से समुद्र में थे। यह छूट 19 अप्रैल तक मान्य है। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की कमी को दूर करना और कीमतों को नियंत्रण में रखना था।
हालांकि, शांति वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर कड़े कदम उठाने के संकेत भी दिए हैं, ताकि तेहरान की तेल आय से होने वाली कमाई पर दबाव बनाया जा सके। डोनाल्ड ट्रंप की इस नीति से साफ तौर पर दबाव और राहत दोनों नजर आता है।
भारत ने इस मौके को तुरंत भांपते हुए अपने हित में इस्तेमाल किया। सरकार ने साफ किया कि कच्चे तेल का आयात पूरी तरह व्यावसायिक निर्णय है और कंपनियों को वैश्विक बाजार से अपनी जरूरत के अनुसार खरीद की पूरी स्वतंत्रता है। इसी नीति के तहत भारत लगातार 40 से अधिक देशों से तेल खरीदकर अपने स्रोतों का विविधीकरण करता रहा है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी तेल की खरीद में किसी तरह की भुगतान संबंधी बाधा नहीं है।
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि भारत ने एक ओर अमेरिकी नियमों और सीमाओं का ध्यान रखा, वहीं दूसरी ओर अपने ऊर्जा हितों से कोई समझौता नहीं किया और संतुलित कूटनीति के जरिए दोनों पक्षों के बीच अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी।
भारत अपनी कुल जरूरत का 88% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में किसी भी वैश्विक संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है, हाल के तनाव के कारण प्रभावित रहा है। भारत के लगभग 50% तेल आयात इसी मार्ग से आते हैं। ऐसे में ईरान से अतिरिक्त सप्लाई मिलना भारत के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 19 अप्रैल तक और भी ईरानी टैंकर भारत पहुंच सकते हैं। लेकिन इसके बाद स्थिति फिर अनिश्चित हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी छूट समाप्त हो जाएगी। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह भविष्य में भी इसी तरह संतुलन बनाते हुए सस्ती और स्थिर ऊर्जा सप्लाई सुनिश्चित करे।
Updated on:
13 Apr 2026 04:57 pm
Published on:
13 Apr 2026 04:56 pm
बड़ी खबरें
View Allराष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
US Israel Iran War
