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समलैंगिक विवाह : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुरुष या महिला की कोई पूर्ण अवधारणा नहीं, समाज में बढ़ी स्वीकार्यता

Same-sex marriage समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज से सुनवाई हुई। सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने गंभीरता से सुना। कभी गरम तो कभी नरम ढंग से सुप्रीम कोर्ट ने पक्षों को समझाया। साथ ही कहाकि, समलैंगिक विवाह की समाज में स्वीकार्यता बढ़ी है।

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Sanjay Kumar Srivastava

Apr 18, 2023

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समलैंगिक विवाह : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुरुष या महिला की कोई पूर्ण अवधारणा नहीं, समाज में बढ़ी स्वीकार्यता

समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी देने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि, पुरुष या महिला की कोई पूर्ण अवधारणा केवल जननांगों के बारे में नहीं हो सकता, बल्कि यह कहीं अधिक जटिल है। केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के समक्ष कहा कि, विधायी मंशा है कि, विवाह केवल एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला के बीच ही हो सकता है, इसमें विशेष विवाह अधिनियम भी शामिल है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने तुषार मेहता से कहा, आप बहुत महत्वपूर्ण निर्णय ले रहे हैं। एक जैविक पुरुष व जैविक महिला की अवधारणा निरपेक्ष है। तुषार मेहता ने कहा कि, एक जैविक पुरुष एक जैविक पुरुष है और यह एक अवधारणा नहीं है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि, 2018 के धारा 377 के नवतेज मामले से आज तक हमारे समाज में समलैंगिक संबंधों को लेकर काफी स्वीकार्यता बढ़ी है और यह एक बड़ी उपलब्धि है। पीठ ने कहा कि, एक विकसित भविष्य के लिए व्यापक मुद्दों को छोड़ा जा सकता है।

यह कहीं अधिक जटिल है - मुख्य न्यायाधीश

मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा, पुरुष या महिला की कोई पूर्ण अवधारणा नहीं है, यह जननांगों की परिभाषा नहीं हो सकती है, यह कहीं अधिक जटिल है। तब भी जब विशेष विवाह अधिनियम (एसएमए) कहता है और स्त्री, पुरुष की अवधारणा पूर्ण नहीं है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास कौन से जननांग हैं।

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निर्णय से पहले सुप्रीम कोर्ट सभी राज्यों को जारी करे नोटिस

तुषार मेहता ने जोर देकर कहा कि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्णय लेने से पहले सभी राज्यों को नोटिस जारी किया जाना चाहिए। मेहता ने प्रस्तुत किया कि विवाह की संस्था व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित करती है, हिंदू विवाह अधिनियम एक संहिताबद्ध व्यक्तिगत कानून है और इस्लाम का अपना निजी कानून है, और उनका एक हिस्सा संहिताबद्ध नहीं है। बेंच - जिसमें जस्टिस संजय किशन कौल, एस रवींद्र भट, हेमा कोहली और पी.एस. नरसिम्हा शामिल हैं, ने उत्तर दिया कि यह व्यक्तिगत कानूनों में नहीं पड़ रहा है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, उनके मुवक्किल चाहते हैं शादी का अधिकार

समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि, उनके मुवक्किल एक घोषणा चाहते हैं कि हमें शादी करने का अधिकार है। एक वकील ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत राज्य द्वारा अधिकार को मान्यता दी जाएगी और इस अदालत की घोषणा के बाद राज्य द्वारा विवाह को मान्यता दी जाएगी। रोहतगी ने तर्क दिया कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि अनुच्छेद 377 के फैसले के बाद भी अब भी हमें कलंकित किया जाता है। विशेष विवाह अधिनियम में पुरुष और महिला के बजाय 'जीवनसाथी' का उल्लेख होना चाहिए।

पुरुष-महिला विवाह कानून का उपहार नहीं - राकेश द्विवेदी

समलैंगिक विवाहों का विरोध करने वाले एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि, पुरुष और महिला के बीच विवाह कानून का उपहार नहीं है, यह प्राचीन काल से अस्तित्व में है और मानव जाति को बनाए रखने के लिए विवाह आवश्यक हैं। द्विवेदी ने तर्क दिया कि, यहां तक कि एसएमए में भी व्यक्तिगत कानूनों को प्रतिबिंबित करने वाले प्रावधान हैं और एक पुरुष और एक महिला के लिए अलग-अलग विवाह योग्य उम्र के बारे में बात करते हैं, और कोई इनके साथ कैसे सामंजस्य स्थापित करेगा (कौन पुरुष है और कौन महिला है)?

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गोद लिए बच्चे का रख्ररखाव कौन करेगा - कपिल सिब्बल चिंतित

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस रिश्तें से उत्पन्न समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहाकि, वह सभी ऐसे रिश्तों के लिए हैं, पर गंभीर सामाजिक परिणामों के बारे में चिंतित हैं। क्या होगा यदि वे एक बच्चे को गोद लेते हैं और बाद में अलग होना चाहते हैं? रखरखाव कौन करे है?

पूरे कानूनी ढांचे को बदलना पड़ेगा - कपिल सिब्बल

कपिल सिब्बल ने कहा कि, यदि टुकड़ों में व्यवस्था की जाएगी, तो अधिक जटिलताएं सामने आएंगी। इससे समुदाय को नुकसान होगा। अन्य देशों में जहां समलैंगिक विवाह को मान्यता दी गई थी, उन्होंने पूरे कानूनी ढांचे को बदल दिया।

समान-लिंग विवाह केवल शहरी अभिजात्य विचार - केंद्र सरकार

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहाकि, समान-लिंग विवाह की मांग सामाजिक स्वीकृति के उद्देश्य से केवल शहरी अभिजात्य विचार है, और समान-लिंग विवाह के अधिकार को मान्यता देने का मतलब कानून की एक पूरी शाखा का आभासी न्यायिक पुनर्लेखन होगा।

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