
कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Photo - ANI)
कांग्रेस के भीतर शशि थरूर के नए बयान को लेकर फिर बवाल मच गया है। कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने अपने सहयोगी थरूर को जमकर सुनाया है।
संदीप दीक्षित ने शुक्रवार को थरूर पर तंज कसते हुए कहा कि मोदी सरकार ने ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हमले की निंदा करने में जो संयम बरता, थरूर ने उसका समर्थन किया है।
दीक्षित ने कहा कि केरल के कांग्रेस सांसद थरूर को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि वे मुद्दों को समझे बिना ही कोई पक्ष ले लेते हैं। उन्होंने आगे कहा कि थरूर नेहरूवादी विदेश नीति की परंपरा पर ध्यान देने के बजाय पेंशन और दूसरों से विनम्रता से बात करने पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
दीक्षित ने मीडिया से बात करते हुए कहा- मेरी राय है कि शशि थरूर को चीजों की ज्यादा समझ नहीं है। अगर कोई बिना समझे कोई पक्ष लेना चाहता है, तो उसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। मेरी नजर में, इस मुद्दे पर थरूर की समझ और टिप्पणियां किसी गंभीर व्यक्ति की तरह नहीं लगतीं।
दीक्षित ने आगे कहा- अगर हम चुपचाप चीजों को स्वीकार करते रहेंगे, तो अपवाद ही नियम बन जाएंगे। वेनेज़ुएला में, अमेरिका ने देश की सीमा के भीतर से ही उसके राष्ट्रपति को उठा लिया था।
उन्होंने आगे कहा कि ईरान में, अमेरिका ने राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दी। अगर हम ऐसी घटनाओं पर चुप रहेंगे, तो अमेरिका को दूसरी जगहों पर ऐसा करने से कौन रोकेगा? किसी भी देश का यह कर्तव्य नहीं है कि वह दूसरे देश के मामलों में दखल दे, चाहे वहां लोकतंत्र हो या न हो।
कांग्रेस नेता ने आगे तर्क दिया कि कुछ परिस्थितियों में देशों की तटस्थता नुकसानदायक साबित हो सकती है। हर देश अपने हितों का ध्यान रखता है। हालांकि, कुछ बड़े सिद्धांत भी काम करते हैं और अगर आप कोई पक्ष नहीं लेते हैं, तो एक ऐसा भी समय आता है, जब काफी नुकसान झेलना पड़ता है।
उन्होंने आगे कहा कि जब हिटलर का राज था, तो कई यूरोपीय देशों ने तय किया था कि वे कुछ नहीं कहेंगे। लेकिन उसके नतीजों को देखिए। अगर ऐसी परिस्थितियां आती हैं, तो इस तरह की तटस्थता नुकसान का कारण बन सकती है।
दीक्षित ने इस बात पर भी जोर दिया कि दिल्ली में ईरानी दूतावास द्वारा खोली गई शोक पुस्तिका पर भारत सरकार की ओर से किसी सरकारी अधिकारी का हस्ताक्षर करना और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत के प्रधानमंत्री का चुप रहना। इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है।
उन्होंने कहा कि विदेश सचिव विदेश नीति बनाने में कोई भूमिका नहीं निभाते। देश की विदेश नीति की झलक तो प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री में ही दिखती है। समय बहुत मायने रखता है।
दीक्षित ने कहा- अगर शशि थरूर यह बात नहीं समझ पाते, तो यह उनकी मर्जी है। लेकिन मैं एक ऐसी गरिमामयी परंपरा से आता हूं, जहां नेहरू ने हमारी विदेश नीति को आकार दिया था।
दीक्षित की यह टिप्पणी तब आई, जब थरूर ने ऐसे भयंकर संघर्ष के समय संयम बरतने के सरकार के रुख का समर्थन किया और जोर देकर कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार होती, तो वे उसे भी यही सलाह देते।
जब थरूर से एक अंग्रेजी अखबार में छपे उनके उस लेख के बारे में पूछा गया, जो भारत की कूटनीतिक कार्रवाइयों पर उनकी पार्टी के रुख से अलग था, तो थरूर ने कहा कि विपक्ष में होने से किसी को भी नैतिक रुख अपनाने की आजादी मिल जाती है, लेकिन उन्होंने सलाह दी कि सरकार को संयम को ही अपनी ताकत बनाना चाहिए।
Published on:
20 Mar 2026 03:22 pm
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