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Shimla Agreement Inside Story: डिनर के बाद सिटिंग रूम में अकेले इंदिरा गांधी व जुल्फिकार अली भुट्टो- शिमला समझौते के आखिरी घंटों की कहानी

Daughter of Destiny: शिमला समझौते की वो 'इनसाइड स्टोरी' जो बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा में लिखी। पढ़िए समझौते की पूरी कहानी...
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भारत

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Vijay Kumar Jha

Jul 02, 2026

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शिमला समझौते पर साइन करते हुए ज़ुल्फिकार अली भुट्टो और इंदिरा गांधी की फ़ाइल फोटो। (Photo Source -X @SBSources)

भारत-पाकिस्तान के बीच 1972 में 2 जुलाई को हुआ शिमला समझौता आज भी दोनों देशों के बीच शांति का मजबूत आधार है। वह समझौता पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो और भारत की मजबूत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच हुआ था। भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर को भी लेकर आए थे। बेनजीर ने शिमला यात्रा का जो ब्योरा अपनी आत्मकथा 'डॉटर ऑफ डेस्टिनी' में दर्ज किया है, उससे समझौते की 'इनसाइड स्टोरी' तो पता चलती ही है, भारतीय मीडिया का भी एक चेहरा दिखता है।

भारत से 1971 की लड़ाई में ढाका को खो देने के चार दिन बाद 20 दिसंबर, 1971 को याहया खान को इस्तीफा देना पड़ा और जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने। उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा 'डॉटर ऑफ डेस्टिनी' में लिखा है कि इसके बाद हार्वर्ड में वह पाकिस्तानी राष्ट्रपति की बेटी के रूप में जानी जाने लगी थीं, लेकिन उन्होंने यह भी लिखा है कि उनके पिता के लिए यह गौरवशाली ओहदा मुल्क के भीषण अपमान और भारी कीमत चुकाने के बाद आया था।

भुट्टो लिखती हैं, 'दो हफ्ते की लड़ाई में हमारी एक-चौथाई वायु सेना और आधी नौसेना बर्बाद हो गई थी। हमारा खजाना खाली हो चुका था। हमारे हाथ से न केवल पूर्वी पाकिस्तान निकल गया था, बल्कि भारतीय सेना ने पश्चिम में भी हमारी 5000 वर्ग मील जमीन पर कब्जा कर लिया था और हमारे 93 हजार लोगों को युद्धबंदी बना लिया था। 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना ने जिस रूप में पाकिस्तान को बनवाया था, वह बांग्लादेश बनने के साथ खत्म चुका था। अनेक लोगों का मानना था कि पाकिस्तान का वजूद नहीं बचेगा।'

बेनजीर को शुरू से ही राजनीतिक गतिविधियों में साथ रखने लगे थे पिता

अगले साल गर्मियों में 28 जून, 1972 को शिमला में जुल्फिकार अली भुट्टो और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच शिमला में समझौता वार्ता तय हुई। बेनजीर छुट्टियों में हार्वर्ड से घर लौटी थीं। राष्ट्रपति भुट्टो ने बेटी बेनजीर से भी शिमला चलने को कहा। इस मीटिंग के नतीजों पर ही पूरे पाकिस्तान की उम्मीदें टिकी थीं।

बेनजीर लिखती हैं, 'बातचीत की मेज पर मेरे पिता खाली हाथ बैठने वाले थे। सारे तीर भारत की ही तरकश में थे- हमारे युद्धबंदी, युद्धापराध का मुकदमा चलाने की धमकी, हमारी 5000 वर्ग मील जमीन…। चंडीगढ़ में जब हमारे पिता का जहाज उतरा तो वह और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के सारे वरिष्ठ सदस्य यही सोच रहे थे कि क्या शिमला में दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलेगी? क्या हम भारत के साथ शांति कायम कर पाएंगे या हमारा देश फिर खाली हाथ रहेगा?'

चेहरे पर न खुशी दिखे, न गम- पिता की इस सलाह से मुश्किल में फंस गई थीं बेनजीर

जुल्फिकार अली भुट्टो ने बेनजीर को समझाया, 'आपके चेहरे पर न तो खुशी दिखनी चाहिए और न गम।' जब बेनजीर ने कहा कि यह तो बड़ा मुश्किल होगा तो भुट्टो बोले- बिल्कुल नहीं।

इसी बीच चंडीगढ़ से उन्हें लेकर शिमला चला हेलिकॉप्टर एक फुटबॉल ग्राउंड पर लैंड कर चुका था। इंदिरा गांधी खुद अगवानी के लिए खड़ी थीं। बेनजीर ने उन्हें 'अस्सलामु अलैयकुम' कहा तो इंदिरा ने भी मुसकुराते हुए 'नमस्ते' किया। अगले पांच दिन उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच ही बीतते रहे। दिन में कोई बताता कि बातचीत अच्छी चल रही है, तो शाम में पता चलता कि उम्मीद की किरण धुंधली ही है।

बेनजीर के पीछे पड़ गए थे लोग और मीडिया भी

बेनजीर लिखती हैं, 'बातचीत की मेज पर जहां गतिरोध टूट नहीं रहा था, वहीं सड़कों पर एक अलग ही नजारा पेश आता था। जब भी मैं हिमाचल भवन से निकलती, रास्ते में लोग मुझे देखने के लिए लाइन लगाए रहते। उत्साहित भीड़ हर जगह मेरे पीछे रहती। मॉल जाने पर तो भीड़ इतनी बढ़ जाती कि ट्रैफिक रोकना पड़ जाता था। मुझे यह देख कर बड़ा अजीब भी लगता था कि आखिर मैंने ऐसा क्या किया है कि लोगों में इस तरह मेरे प्रति दीवानगी है।'

भारत में बेनजीर का स्वागत करने संबंधी संदेशों वाले खतों और तार का अंबार लग गया था। किसी ने तो यहां तक लिखा था कि जुल्फिकार अली भुट्टो बेनजीर को भारत का राजदूत बना दें। बेनजीर का इंटरव्यू लेने के लिए पत्रकारों की भीड़ लग गई। ऑल इंडिया रेडियो ने उन्हें बोलने के लिए बुलाया।

चर्चा का विषय बन गए बेनजीर के कपड़े

बेनजीर के कपड़ों की जोरदार चर्चा होने लगी। ये कपड़े वह अपनी सहेली की बहन से उधार लेकर आई थीं, क्योंकि उनके पास ज़्यादातर सलवार-कमीज, जींस और स्वेटशर्ट ही थीं। हार्वर्ड में भी वह पहनावे पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थीं।

इंटरव्यू में भी बेनजीर के पहनावों पर सवाल होते थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'फ़ैशन अमीरों के शौक होते हैं।' उनके इस बयान पर भी अगले दिन अखबारों में पॉज़िटिव स्टोरी बनी- बेनजीर ने फैशन की दुनिया में एक नई मिसाल कायम की है।

30 जून को डिनर के वक्त बेनजीर ने मां की दी हुई सिल्क साड़ी पहनी हुई थी। इंदिरा गांधी उन्हें ही देख रही थीं। उन्होंने बेनजीर को सलाह दी की साड़ी को मजबूती से बांधें। इस सलाह से वह नर्वस हो गईं। उन्हें लगने लगा उनकी साड़ी अचानक खुल तो नहीं जाएगी। उन्हें उनकी ताई मुमताज याद आ गईं, जिनके साथ जर्मनी के एक सुपरमार्केट में ऐसा हादसा हो गया था। उनकी साड़ी एस्केलेटर में फंस कर खुल गई थी।

वार्ता में नहीं हो रही थी कोई प्रगति, जुल्फिकार भुट्टो ने कहा- सामान समेट लो

इधर बेनजीर सुर्खियां बटोर रही थीं, लेकिन वार्ता की मेज पर कुछ खास नहीं हो रहा था। कश्मीर के मसले पर बात अटकी हुई थी।

2 जुलाई को जुल्फिकार अली भुट्टो ने बेनजीर से कहा- सामान समेट लो, हम कल वापस जा रहे हैं। बेनजीर ने पूछा-बिना समझौता किए? इस पर जवाब मिला- भारत की ओर से लादे गए समझौते पर दस्तखत करने से अच्छा है खाली हाथ अपने देश लौट जाना।

अब शाम 4.30 बजे इंदिरा गांधी से एक शिष्टाचार मुलाक़ात होनी थी और रात में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की ओर से डिनर आयोजित करने के बाद अगले दिन रवाना हो जाना था।

जुल्फिकार अली भुट्टो की आखिरी कोशिश

बेनजीर अपने कमरे में जमीन पर बैठी हुई थीं। तभी जुल्फिकार अली भुट्टो कमरे में आए। उनकी आंखों में चमक थी। कमरे में घुसते ही वह बोले, 'किसी से कहना मत। प्रोटोकॉल के तहत होने वाली इस मुलाक़ात में मैं एक आखिरी कोशिश करूंगा। मेरे दिमाग में एक आइडिया है। पर अगर यह कारगर नहीं रहा तो नाउम्मीद होने की भी जरूरत नहीं है।'

बेनजीर पिता के लौटने की राह देखने लगीं। वह लौटे तो उनका चेहरा उम्मीदों और मुस्कान से भरा था। उन्होंने कहा, 'इंशाअल्लाह! हम समझौता करके लौटेंगे।' वह इंदिरा गांधी से एक आश्वासन लेकर लौटे थे। उन्होंने उनके सामने अपनी बात रखी, जिस पर प्रधानमंत्री ने कहा कि सलाहकारों से विचार-विमर्श कर रात में डिनर के वक्त अपना फैसला सुनाएंगी।

डिनर के बाद वार्ता का आखिरी दौर

रात में डिनर के बाद इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो एक छोटे से सिटिंग रूम में चले गए। दोनों के प्रतिनिधिमंडल के लोग बड़े से बिलियर्ड रूम में चले गए। वे बिलियर्ड टेबल का इस्तेमाल डेस्क के तौर पर कर रहे थे। जब भी किसी मुद्दे पर वे अपनी बात पूरी कर लेते या किसी बात पर असहमति होती तो प्रतिनिधिमंडल से कोई एक सदस्य कागज लेकर सिटिंग रूम में जाता और अपने नेता की 'हां' या 'ना' लिख कर वापस आता था।

बार-बार ड्राफ्ट बनाए जा रहे थे, उसे सुधारा-बदला जा रहा था। पत्रकारों और दोनों देशों के प्रतिनिधियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। पाकिस्तानी लोग लगातार नीचे से ऊपर आ-जा रहे थे। बेनजीर ऊपर बेडरूम में थीं। वह सीढ़ियों से आवाज लगातीं- कुछ हुआ क्या? लेकिन, बिना आधिकारिक घोषणा के कुछ कहना मुश्किल था। ऐसे में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने एक रास्ता निकाला, 'समझौता हुआ तो कहेंगे लड़का हुआ है, नहीं हुआ तो कहेंगे लड़की हुई है।'

'लड़का हुआ', रात के 12.40 बजे गूंजा शोर

सिटिंग रूम में जाते हुए जुल्फिकार अली बेटी से कह गए थे- अगर समझौता हुआ तो दस्तखत होते वक्त तुम नीचे आ जाना। यह एक ऐतिहासिक लम्हा होगा।

रात के 12.40 बजे बेनजीर के फ्लोर पर 'लड़का है! लड़का है!' का शोर मच गया। बेनजीर भाग कर नीचे आईं। हालांकि, बेनजीर उस ऐतिहासिक पल पर कमरे में दाखिल नहीं हो पाईं। उस समझौते पर दस्तखत हो चुके थे, जो इतिहास में 'शिमला समझौता' के नाम से हमेशा के लिए दर्ज है।

यह बात अलग है कि आगे चल कर पाकिस्तान ने अनेक बार इस समझौते का उल्लंघन किया। पुलवामा हमले के बाद भारत की कार्रवाई पर बौखला कर पाकिस्तान ने शिमला समझौते को निलंबित भी कर दिया था।