
सुप्रीम कोर्ट (फोटो-ANI)
Supreme Court on AI: सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर न्यायिक व्यवस्था में सावधानी बरतने की सख्त जरूरत बताई है। अदालत ने कहा है कि वकील और जजों को AI पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे न्याय प्रक्रिया की मौलिकता और विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई जिसमें एनसीएलटी के एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने अपने निर्णय में ऐसे कानूनी उदाहरणों पर भरोसा किया था जो वास्तव में मौजूद ही नहीं थे और जिन्हें AI टूल्स की मदद से तैयार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि AI की एक बड़ी समस्या यह है कि यह कभी-कभी फर्जी या काल्पनिक कानूनी सामग्री भी तैयार कर देता है। अगर ऐसे संदर्भों का इस्तेमाल अदालत के फैसलों में किया जाए तो यह न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि AI से तैयार ऐसी सामग्री का कानून में इस्तेमाल न्याय व्यवस्था में मिथाइल आइसोसाइनेट फैलने जैसा है। यह ऐसा खतरा है जो दिखता नहीं लेकिन धीरे-धीरे पूरी न्यायिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है। अदालत ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर गलत या गैर-मौजूद कानूनी उदाहरणों का इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मामला एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स की दिवालिया प्रक्रिया से जुड़ा था। जम्मू-कश्मीर बैंक ने कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए याचिका दायर की थी। एनसीएलटी मुंबई बेंच ने 28 अगस्त 2024 को कंपनी के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया था। बाद में एनसीएलएटी ने 11 सितंबर 2025 को इस फैसले को बरकरार रखा।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इन फैसलों में जिन कानूनी उदाहरणों का हवाला दिया गया वे असल में मौजूद ही नहीं थे और AI से तैयार किए गए थे। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएलटी और एनसीएलएटी दोनों के फैसले रद्द कर दिए और मामले को तथ्यों के आधार पर दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि तकनीक का इस्तेमाल अदालतों में सहायक के तौर पर किया जा सकता है लेकिन अंतिम फैसला हमेशा इंसान को ही लेना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के हर चरण में इंसानी नियंत्रण पूरी तरह बना रहना चाहिए।
अदालत ने कहा कि AI आज इंसानों की तरह कई बौद्धिक काम करने में सक्षम हो गया है। बढ़ते काम के बोझ के बीच पेशेवर लोग इसका इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं। कोर्ट ने ब्रिटेन की गारफील्ड लॉ लिमिटेड का भी जिक्र किया जिसे AI आधारित कानूनी सेवाएं देने वाली पहली लॉ फर्म के रूप में मंजूरी मिली है।
हालांकि अदालत ने कहा कि AI काम को तेज और आसान बना सकता है लेकिन यह इंसानी सोच, तर्क और कानूनी समझ का विकल्प नहीं बन सकता। न्याय व्यवस्था में ह्यूमन इन द लूप यानी हर स्तर पर इंसानी निगरानी और नियंत्रण जरूरी है।
अदालत ने कहा कि AI सिर्फ काम में मदद करने वाला साधन नहीं रह गया है बल्कि यह इंसानों की सोच, तर्क और फैसले लेने की क्षमता का विकल्प बनने की दिशा में बढ़ रहा है। इसलिए जजों और वकीलों को इसका इस्तेमाल करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर बिना नियंत्रण के AI पर भरोसा बढ़ता गया तो लोग धीरे-धीरे अपने पेशेवर फैसलों के लिए उसी पर निर्भर होने लगेंगे। इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि AI में हैलुसिनेशन जैसी तकनीकी समस्याओं को कैसे दूर किया जाए यह तय करना इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का काम है।
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया से कहा है कि वह इस मुद्दे पर एक कमेटी बनाए और न्यायिक प्रक्रिया में AI के इस्तेमाल का विस्तार से अध्ययन करे।
Updated on:
02 Jul 2026 03:36 pm
Published on:
02 Jul 2026 03:05 pm
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