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क्या भारत में अमेरिकी रुचि अब सिर्फ बाजार तक सीमित, ‘US Indo-Pacific Command’ नाम से ‘इंडो’ शब्द हटाने के क्या है मायने?

US-Pacific Command: अमेरिका की ओर से यूएस इंडो पेसिफिक कमांड शब्द से इंडो शब्द हटाने का मतलब यह लगाया जा रहा है कि अमेरिका भारत को अपने बराबर नहीं समझता और उसे अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है। मधुर राजनयिक रिश्तों के नजरिये से यह कदम तर्कसम्मत और उचित नहीं है।

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भारत

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MI Zahir

Jun 20, 2026

US India Relations News

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। ( फोटो : ANI)

India-US Relations : भारत से प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है और अमेरिकी प्रशासन भारतीय प्रतिभाओं को गंभीरता से नहीं ले रहा है। पहले अवैध भारतीयों को बंधक बना कर भारत भेजना, व्यापार की सख्त शर्तें लागू करना कोई मामूली बात नहीं और उसके बाद भारतीय जहाजों पर अमेरिकी हमले में तीन भारतीयों की मौत हो गई, वहीं 'यूएस इंडो पैसिफिक कमांड' नाम से 'इंडो' शब्द हटा दिया गया। इन सबका मतलब यह निकलता है कि अमेरिका भारत को केवल व्यापारिक साझीदार समझता है,एक ऐसा पार्टनर, जिसकी शर्तें अमेरिका तय करेगा और भारत को उसे मानना होगा।

किसी भी एक शक्ति को उपमहाद्वीप पर हावी होने से रोकना है: अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री

अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री ने कहा कि दक्षिण एशिया में अमेरिकी नीति का मुख्य उद्देश्य किसी भी एक शक्ति को उपमहाद्वीप पर हावी होने से रोकना है, और वाशिंगटन ने हाल ही में अपने इंडो-पैसिफिक कमांड के नाम से 'इंडो' शब्द हटा दिया है। ये घटनाक्रम क्वाड के घटते महत्व और 'इंडो-पैसिफिक' शब्द के स्थान पर 'एशिया-पैसिफिक' शब्द के बढ़ते प्रचलन के बीच हो रहे हैं। इसके निहितार्थों को नजरअंदाज करना अब कठिन होता जा रहा है।

भारत में अमेरिकी रुचि विशाल बाजार तक अधिक पहुंच बनाने तक सीमित

वाशिंगटन अब भारत के उदय को अमेरिकी हितों के लिए स्वाभाविक रूप से लाभकारी नहीं मानता। इसके बजाय, वह भारत को एक संभावित आर्थिक और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगा है जिसकी शक्ति को नियंत्रित और सीमित किया जाना चाहिए। भारत में अमेरिकी रुचि अब मुख्य रूप से भारत में अमेरिकी रुचि विशाल बाजार तक अधिक पहुंच बनाने और रणनीतिक पहुंच बढ़ाने तक सीमित है। पिछले साल भारत पर लगाए गए 50% दंडात्मक टैरिफ, भारत को अमेरिका या अमेरिका से जुड़े ऊर्जा स्रोतों पर अधिक निर्भर बनाने के प्रयास, फरवरी का एकतरफा व्यापार ढांचा समझौता और आगामी द्विपक्षीय व्यापार समझौता, ये सभी अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हैं। इस संबंध में सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने एक्स पर टवीट कर अपनी बेबाक राय दी है।

'प्रधानमंत्री मोदी इस स्पष्ट बदलाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखते'

चेलानी का ख्याल है कि फिर भी प्रधानमंत्री मोदी इस स्पष्ट बदलाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखते। इस सप्ताह उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से कहा कि फरवरी 2025 में हुई उनकी पिछली मुलाकात के बाद से द्विपक्षीय संबंधों में "काफी प्रगति" हुई है। वास्तविकता में, इस दौरान संबंधों को कई बड़े झटके लगे हैं। इस बीच, भारत के विदेश मंत्री "विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी को गहरा करने" की बात करते रहते हैं।

'अमेरिका के बारे में मोदी प्रशासन की धारणाएं मौजूदा घटनाक्रमों से प्रभावित'

वाशिंगटन की नीति में आए बदलाव के प्रभावों को स्वीकार करने के बजाय, मोदी प्रशासन रणनीतिक तालमेल को गहरा करने की बात को बढ़ावा देता रहता है, जिससे वह इस सवाल और विपक्ष के हमलों से बचता रहता है कि क्या अमेरिका के बारे में उसकी धारणाएं मौजूदा घटनाक्रमों से प्रभावित हो गई हैं।

यह फ़ैसला कमांड की ऐतिहासिक पहचान बहाल करने के लिए लिया गया था

गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए 2018 में इस कमांड का नाम बदला गया था,इस कदम को इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका को मान्यता देने के तौर पर देखा गया। इस बदलाव की घोषणा करते हुए, 'यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड नाम से 'इंडो' शब्द हटाने के मामले पर अमेरिकी रक्षा विभाग ने कहा कि यह फ़ैसला कमांड की ऐतिहासिक पहचान को बहाल करने के लिए लिया गया था।

अमेरिका भारत को अपने बराबर तरक्की करते हुए नहीं देख सकता

ताजा अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत का नामोनिशान नहीं है, अमेरिकी उप विदेश मंत्री ने भारतीय धरती से घोषणा की है कि वाशिंगटन भारत को आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बनने नहीं देगा। इन सब बातों का मतलब यह है कि अमेरिका भारत को अपने बराबर तरक्की करते हुए नहीं देख सकता, वह उसे खुद से कमतर और अपना आज्ञाकारी देश बनाए रखना चाहता है, उसकी नजर में भारत के साथ ऐसे राजनयिक संबंध, जिनमें बराबरी के लिए जगह नहीं है, वह चाहता है कि बस भारत 'जी हुजूरी' और 'हां' में 'हां' किए जाए।