
सुप्रीम कोर्ट (File Photo)
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजर अंदाज करना संभव नहीं है। वर्तमान को समझने के लिए अतीत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने उन दो महिलाओं की ओर से दलीलें रखीं, जिन्होंने 2018 के फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया था। जयसिंह ने यह भी तर्क दिया कि अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह 'हाथ खींच' नहीं सकतीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है।
एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के अनुसार, संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और मौलिक अधिकारों की व्याख्या अलग-थलग नहीं की जा सकती। धर्म समय के साथ विकसित होता है और स्थिर नहीं रहता। इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अनुच्छेद 25(2-B) सामाजिक सुधार के लिए राज्य को कानून बनाने की अनुमति देता है, लेकिन यह अपने आप में कोई मौलिक अधिकार नहीं है। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी कहा- सुधार के नाम पर धर्म को खोखला मत कीजिए। सदियों से चले आ रहे अनुष्ठानों और परंपराओं को यूं ही नहीं खोला जा सकता।
जयसिंह ने 'एसेंशियल रिलीजन प्रैक्टिस' (आवश्यक धार्मिक प्रथा) परीक्षण को पूरी तरह खत्म करने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि अदालतों को यह देखना होगा कि किसी प्रथा को हटाने से धर्म के मूल स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा। हालांकि, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला सुंदरेश ने कहा कि इस परीक्षण को लागू करते समय अदालतों को अत्यंत सतर्क रहना होगा, जबकि जस्टिस पी.एस. अमानुल्लाह ने चिंता जताई कि ऐसा करने पर अदालतें 'धर्मशास्त्री' की भूमिका निभाने लगेंगी।
Updated on:
30 Apr 2026 04:30 am
Published on:
30 Apr 2026 04:30 am
