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सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि आस्था व अंतरात्मा के मामलों को न्यायिक बहस का विषय नहीं बनाया जा सकता है।

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भारत

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Vinay Shakya

Apr 30, 2026

supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजर अंदाज करना संभव नहीं है। वर्तमान को समझने के लिए अतीत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने उन दो महिलाओं की ओर से दलीलें रखीं, जिन्होंने 2018 के फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया था। जयसिंह ने यह भी तर्क दिया कि अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह 'हाथ खींच' नहीं सकतीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने की तल्ख टिप्पणी

एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के अनुसार, संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और मौलिक अधिकारों की व्याख्या अलग-थलग नहीं की जा सकती। धर्म समय के साथ विकसित होता है और स्थिर नहीं रहता। इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अनुच्छेद 25(2-B) सामाजिक सुधार के लिए राज्य को कानून बनाने की अनुमति देता है, लेकिन यह अपने आप में कोई मौलिक अधिकार नहीं है। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी कहा- सुधार के नाम पर धर्म को खोखला मत कीजिए। सदियों से चले आ रहे अनुष्ठानों और परंपराओं को यूं ही नहीं खोला जा सकता।

जयसिंह ने 'एसेंशियल रिलीजन प्रैक्टिस' (आवश्यक धार्मिक प्रथा) परीक्षण को पूरी तरह खत्म करने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि अदालतों को यह देखना होगा कि किसी प्रथा को हटाने से धर्म के मूल स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा। हालांकि, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला सुंदरेश ने कहा कि इस परीक्षण को लागू करते समय अदालतों को अत्यंत सतर्क रहना होगा, जबकि जस्टिस पी.एस. अमानुल्लाह ने चिंता जताई कि ऐसा करने पर अदालतें 'धर्मशास्त्री' की भूमिका निभाने लगेंगी।

कोर्ट में बहस का अंश

  • एडवोकेट इंदिरा जयसिंह: मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश से किसी को कानूनी नुकसान नहीं होता। यदि कोई महिला धार्मिक मान्यता के कारण मंदिर नहीं जाना चाहती है तो वह उसका विकल्प है, लेकिन सभी महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
  • जस्टिस नागरत्ना: परंपरा चलेगी या एक महिला की इच्छा?
  • एडवोकेट इंदिरा जयसिंह: यह इच्छा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का प्रश्न है।
  • जस्टिस अमनुल्लाह: क्या किसी धार्मिक स्थल पर जाकर वहां के लोगों की भावनाओं को आहत करना 'श्रद्धा' कहलाएगा?
  • एडवोकेट इंदिरा जयसिंह: केवल भावनाएं आहत होना, कानूनी क्षति नहीं माना जा सकता।
  • जस्टिस सुंदरेश: यदि हर व्यक्ति अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार आचरण करने लगे, तो इससे अव्यवस्था फैल सकती है।
  • जस्टिस नागरत्ना: यह धर्म को समाप्त करने जैसा होगा, जिसका हम हिस्सा नहीं बनना चाहते। अंतरात्मा के मुद्दों पर धर्मनिरपेक्ष अदालत में बहस नहीं हो सकती।