18 अप्रैल 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सबरीमाला केस: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- धर्म का पालन करने का अधिकार व्यक्ति की अंतरात्मा की आजादी से आता है

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला रिव्यू पिटीशन एवं धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इन मामलों पर सुनवाई के दौरा कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है।

2 min read
Google source verification

भारत

image

Vinay Shakya

Apr 18, 2026

supreme court transgender case teacher recruitment delhi application allowed

सुप्रीम कोर्ट (सोर्स-ANI)

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच ने केरल के सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और कई धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे और दायरे से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की। इस बेंच में CJII सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धर्म को आजादी से मानने और फैलाने का अधिकार, जमीर की आजादी से आता है और यह जमीर की आजादी पहले बननी चाहिए। तभी कोई इंसान आजादी से उन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है। कोर्ट की पीठ ने आगे कहा कि किसी धार्मिक व्यक्ति के, किसी धार्मिक रीति-रिवाज (प्रथा) के सही होने पर सवाल उठाने की संभावना कम होती है। कोर्ट ने पूछा कि क्या उस सही होने की जांच तब की जा सकती है, जब चुनौती किसी नास्तिक की ओर से आए?

बेंच और अधिवक्ता के बीच तीखी बहस

कोर्ट की बेंच ने सीनियर वकील राजीव धवन, वी गिरी और एम आर वेंकटेश की दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने धवन से पूछा- क्या किसी नास्तिक के कहने पर किसी धार्मिक प्रथा के सही होने पर सवाल उठाया जा सकता है? इस पर धवन ने कहा कि कार्रवाई का कारण मानने वाले के पास होगा।

धवन ने कहा- मान लीजिए कि भारतीय वकीलों का एक संघ है, जो कहता है कि देखो हम व्युत्पन्न (Derived) हैं और हम वह दावा कर रहे हैं, उनका ठिकाना होगा। जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि लेकिन मानने वाला कभी भी उस प्रैक्टिस के सही होने पर सवाल नहीं उठाएगा। इस पर धवन ने जोर देकर कहा कि एंट्री का कारण हमेशा मानने वाले के पास होगा।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा- देखिए, पीड़ित व्यक्ति संविधान के सिद्धांतों पर नहीं हो सकता। यह धार्मिक रीति-रिवाजों के सवाल पर होना चाहिए, क्योंकि लंच से ठीक पहले आपने कहा था कि रीति-रिवाजों की तर्कसंगतता वगैरह पर विचार नहीं किया जा सकता है। जस्टिस के सवाल पर धवन ने स्पष्ट किया कि वह तर्कसंगतता पर बहस नहीं कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जब धर्म का कोई गैर-सदस्य किसी सदस्य के कारण का प्रतिनिधित्व करता है तो यह व्युत्पन्न जनहित याचिका है।

सीनियर वकील राजीव धवन ने दलील दी कि मैं एक हिंदू हूं जिसने बाबरी मस्जिद (केस) में मुस्लिमों का केस लड़ा था। बेशक, मुझे घर पर मलमूत्र के पैकेट मिलने लगे और कोर्ट में मुझ पर हमला हुआ। आपके लॉर्डशिप ने मुझसे पूछा, क्या मुझे सुरक्षा चाहिए और मैंने कहा नहीं। अब सवाल यह है कि मैं उन्हें प्रतिनिधित्व करता हूं जो यौगिक (कंपाउंड) हैं। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वह वकील नहीं हैं, बल्कि कोर्ट में आने वाले और कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले पक्ष हैं।