
सुप्रीम कोर्ट (ANI)
Supreme Court UAPA Bail: सुप्रीम कोर्ट में यूएपीए (UAPA) मामलों में जमानत को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। दिल्ली दंगा 2020 के आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने सवाल उठाया कि 'अगर ट्रायल में देरी होती, तो क्या आतंकी अजमल कसाब को भी जमानत दे दी जाती' केंद्र ने कहा कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में 'जेल ही नियम' होना चाहिए। वहीं, हालिया फैसलों में कोर्ट ने 'बेल ही नियम है' का सिद्धांत अपनाया है। अलग-अलग फैसलों के टकराव के बाद केंद्र ने मामले को बड़ी बेंच को भेजने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में 18 मई को जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने एक यूएएपीए आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दी थी। उस दौरान कोर्ट ने कहा था कि 'बेल ही नियम है और जेल अपवाद है'। कोर्ट का मानना था कि सुनवाई में देरी होने पर किसी को अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता। लेकिन, केंद्र सरकार इस फैसले के पूरी तरह खिलाफ खड़ी हो गई है।
दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश एएसजी एस वी राजू ने कोर्ट के सामने कहा कि 'अगर आप अजमल कसाब का मामला देखें, तो उसमें गवाहों की संख्या बहुत ज्यादा है। क्या आप उसे जमानत दे देंगे, यह देखते हुए कि वह 7 या 8 साल से जेल में है? ऐसा नहीं किया जा सकता। इसलिए, आपको हर मामले के तथ्यों की जांच करनी होगी। मान लीजिए, अगर हाफिज सईद को पाकिस्तान से लाकर उस पर मुकदमा चलाया जाता है, और वह 5 साल तक जेल में रहता है क्योंकि गवाहों की संख्या बहुत ज्यादा है और आपको विदेश से सबूत इकट्ठा करने हैं, तो क्या आप उसे यह कहकर जमानत पर रिहा कर देंगे कि 'नहीं, नहीं, 5 साल बीत चुके हैं।'
सरकारी वकील ने कोर्ट को याद दिलाया कि दिल्ली दंगों में 53 बेकसूर लोगों की जान गई थी। उन्होंने 18 मई के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उस जजमेंट के हिसाब से तो अपराध की गंभीरता और आरोपी के रोल को देखने की जरूरत ही नहीं बची है। एस वी राजू ने कहा कि 'हर केस को उसके फैक्ट्स के आधार पर देखा जाना चाहिए।' उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ही एक पुराने फैसले 'गुलफिशा फातिमा केस' का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने माना था कि सिर्फ जेल में लंबा वक्त बीत जाना ही जमानत का इकलौता आधार नहीं हो सकता। सरकारी वकील ने कोर्ट में कहा कि 'इस तरह 'नजीब' के सिद्धांत की व्याख्या की गई और वर्तमान में इसे सही ढंग से लागू भी किया जा रहा है। आप केवल 'देरी' का हवाला देकर बात खत्म नहीं कर सकते। मान लीजिए कि यह देरी अभियुक्त के कारण हुई है, तो आप यह नहीं कह सकते कि उसे जमानत दे दी जाए।'
यूएएपीए जैसे कड़े आतंकवाद विरोधी कानून में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों के फैसलों में बड़ा विरोधाभास आ चुका है। एक तरफ जहां 'गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य' और 'गुलफिशा फातिमा' केस में कोर्ट ने कहा था कि आतंकी मामलों में जेल ही नियम है और बेल सिर्फ एक अपवाद। वहीं दूसरी तरफ, 18 मई वाले फैसले ने इसे संविधान के आर्टिकल 21 और 22 का उल्लंघन बताते हुए आरोपी को राहत दे दी थी।
इसी टकराव को देखते हुए केंद्र सरकार चाहती है कि अब देश की बड़ी बेंच इस पर एक अंतिम और कड़ा फैसला सुनाए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत और इस मामले को बड़ी बेंच को भेजने के सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसे सोमवार 25 मई को सुनाया जा सकता है।
Updated on:
22 May 2026 04:07 pm
Published on:
22 May 2026 04:06 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
