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UPSC Lateral Entry: सिविल सेवाओं की लेटरल भर्ती में कोटा न होने पर मचा घमासान, इन कारणों से हो रहा विवाद

UPSC Lateral Entry: जम्मू-कश्मीर और हरियाणा विधानसभा चुनावों की घोषणा के बीच इस सूचना से घमासान मच गया क्योंकि लेटरल भर्ती में आरक्षण का प्रावधान नहीं है। पढ़िए शादाब अहमद की खास रिपोर्ट ...

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UPSC Lateral Entry: एक तरफ देश में अखिल भारतीय सेवा के 20 फीसदी पद रिक्त चल रहे हैं और दूसरी तरफ यूपीएससी ने 45 पदों के लिए लेटरल भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। जम्मू-कश्मीर और हरियाणा विधानसभा चुनावों की घोषणा के बीच इस सूचना से घमासान मच गया क्योंकि लेटरल भर्ती में आरक्षण का प्रावधान नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में आरक्षण के मुद्दे पर चुनाव लड़ने के कारण विपक्ष को फायदा हुआ था। इसलिए दो राज्यों के चुनाव में भी यह विपक्ष का मुद्दा बनता दिख रहा है। देश में अखिल भारतीय सेवा के कुल 15 हजार 106 पद हैं। इनमें 12 हजार 162 पद भरे हुए हैं, जबकि 2944 पद रिक्त हैं।

नीति आयोग की 2017 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि निजी क्षेत्र के अनुभवी उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को भी विभिन्न सरकारी विभागों में संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव स्तर के पदों पर नियुक्त किया जाए ताकि ब्यूरोक्रेसी को और गति मिले। इसके बाद 2018 में यूपीएससी में लेटरल एंट्री की शुरुआत हुई थी। पहले दौर में 6077 आवेदन आए और 63 पदों पर भर्ती हुई।

इस बार यूपीएससी ने संयुक्त सचिव के 10 और निदेशक/उप सचिव के 35 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे हैं। गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में एक-एक पद पर संयुक्त सचिव की भर्ती होगी। कृषि मंत्रालय में आठ, शिक्षा मंत्रालय में दो और विदेश मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय में एक-एक पद पर निदेशक/उप सचिव की भर्ती होगी। ये भर्तियां तीन साल के अनुबंध पर की जाएंगी और परफॉर्मेंस और जरूरत के हिसाब से इसे पांच साल तक बढ़ाया भी जा सकता है। राज्य/संघ के निजीकरण, सार्वजनिक निगम, वैधानिक छात्र, शोधार्थी और व्यापारी और निजी क्षेत्र से योग्यता और अनुभव रखने वाले व्यक्तिगत आवेदन करने के पात्र हैं।

भर्ती पर विवाद के कारण

  1. आरक्षण पर प्रभाव: लेटरल भर्ती से आरक्षण नीति को साइड लाइन करने का आरोप लगाया जा रहा है। विरोध करने वाले तर्क दे रहे हैं कि इस भर्ती प्रक्रिया से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों को नुकसान पहुंच सकता है।
  2. भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता: लेटरल भर्ती की प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि चयन प्रक्रिया में उच्च पदस्थ लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे योग्य उम्मीदवारों को उचित अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
  3. अनुभव और क्षमता का मुद्दा: लेटरल भर्ती के तहत चयनित उम्मीदवारों का अनुभव और उनकी प्रशासनिक क्षमताओं पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। संयुक्त सचिव के पद पर पहुंचने के लिए अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी को लंबा प्रशासनिक अनुभव लेना पड़ता है।

लेटरल पद्धति में कोटा लागू नहींः जितेन्द्र

लोकसभा में 24 जुलाई को केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत व पेंशन मंत्रालय और प्रधान मंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि भारत सरकार में संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव के स्तर पर लेटरल भर्ती विशिष्ट कार्यों के लिए निजी क्षेत्र के पेशेवरों की नियुक्ति के लिए अपनाई गई। इसके माध्यम से वर्ष 2018 से 2023 तक कुल 63 नियुक्तियां की गई हैं। इनमें से 35 नियुक्तियां निजी क्षेत्र से हुई हैं। वर्तमान में 57 अधिकारी पद पर कार्यरत हैं। अन्य पात्र उम्मीदवारों के साथ आरक्षित श्रेणियों के पात्र उम्मीदवारों पर विचार किया जाता है, लेकिन ऐसी एकल पद नियुक्ति के लिए आरक्षण लागू नहीं है।

विपक्ष का चौतरफा हमला

  • नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी संघ लोक सेवा आयोग की जगह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जरिए लोकसेवकों की भर्ती कर संविधान पर हमला कर रहे हैं। लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती कर खुलेआम एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग का हक छीना जा रहा है।
  • सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा अपनी विचारधारा के संगी-साथियों को पिछले दरवाज़े से यूपीएससी के उच्च सरकारी पदों पर बैठाने की जो साजिश कर रही है, उसके खिलाफ एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने का समय आ गया है। ये तरीका आज के अधिकारियों के साथ, युवाओं के लिए भी वर्तमान और भविष्य में उच्च पदों पर जाने का रास्ता बंद कर देगा। आम लोग बाबू व चपरासी तक ही सीमित हो जाएंगे।
  • बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि केंद्र में 45 उच्च पदों पर सीधी भर्ती का निर्णय सही नहीं है क्योंकि, इससे नीचे के पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को पदोन्नति के लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। इसके साथ ही, इन सरकारी नियुक्तियों में एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के लोगों को उनके कोटे के अनुपात में अगर नियुक्ति नहीं दी जाती है तो यह संविधान का सीधा उल्लंघन होगा।

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