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‘बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है, तो हमको उसका राशन मिलता है…’, असम राइफल्स के इस गाने की ये है पूरी कहानी

असम रेजिमेंट का गाना है 'बदलू राम का बदन जमीन के नीचे है, तो हमको उसका राशन मिलता है...', जानिए, असल में गाने के पीछे की कहानी क्या है...

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Assam Regiment

असम रेजिमेंट (फोटो- IANS)

साल 1944 में भारत तब गुलामी की जंजीरों में जकरा हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण दुनिया भर में जंग छिड़ी हुई थी। इसकी आंच भारत के पूर्वोत्तर तक आ गई थी। ब्रिटिश आर्मी में तैनात भारतीय सैनिक मित्र राष्ट्र की ओर से जंग लड़ रहे थे। धुरी राष्ट्र में (जापान, जर्मनी और ऑस्ट्रिया) थे। जापानी सेना लगातार एशिया के पूर्वी भागों को एक-एक करके कब्जा किए जा रही थी। वह म्यामांर को पार करके पूर्वोत्तर भारत में दाखिल हो गई।

कोहिमा की घाटी में ब्रिटिश इंडियन आर्मी और जापानी सेना के बीच जंग छिड़ी हुई थी। इसी जंग में एक नाम अमर हो गया, राइफलमैन बदलूराम, लेकिन उनकी कहानी सिर्फ शहादत की नहीं, बल्कि एक ऐसे बलिदान की है, जो मरने के बाद भी साथियों को जिंदा रखता रहा। वहीं से असम रेजिमेंट का गाना बन गया, 'बदलू राम का बदन जमीन के नीचे है, तो हमको उसका राशन मिलता है…'

कोहिमा की लड़ाई में शहीद हुए थे राइफलमैन बदलूराम

ब्रिटिश भारतीय सेना के असम रेजिमेंट के राइफलमैन बदलूराम कोहिमा और इम्फाल की लड़ाई में जापानी सेना के खिलाफ डटे हुए थे। यहां जापानी सेना ने भारी हमला बोला था। असम रेजिमेंट की 1st बटालियन यहां पहले कतार में थी। इसी बटालियन में राइफलमैन बदलूराम तैनात थे। जंग के शुरुआती दिनों में भी भीषण जापानी गोलीबारी की चपेट में आने से वह शहीद हो गए। उनकी मौत एक सामान्य घटना लगती थी, लेकिन यहीं से कहानी बदल गई।

जापानी सेना ने की थी मजबूत घेराबंदी

जापानी सेना ने ब्रिटिश आर्मी की मजबूत घेराबंद करके रखी थी। इसके चलते बटालियन में राशन की भारी कमी हो गई थी। पर कंपनी के क्वार्टरमास्टर (राशन और आपूर्ति प्रभारी) ने बदलूराम की मौत की सूचना पर उनके नाम को राशन रजिस्टर से काटना भूल गए या जानबूझकर नहीं काटा। उस समय की व्यवस्था में मृत सैनिक का नाम रजिस्टर से हटाने में कभी-कभी देरी हो जाती थी। नतीजतन, बदलूराम के नाम पर आवंटित राशन आना जारी रहा।

बदलूराम का राशन खाकर लड़ी सेना

यह अतिरिक्त राशन कंपनी के लिए वरदान साबित हुआ। सैनिकों ने इस "एक्स्ट्रा" राशन को संभालकर रखा और कठिन घेराबंदी के दिनों में इस्तेमाल किया। इससे न केवल भूख से मौत का खतरा टला, बल्कि वे लड़ाई में और मजबूती से डटे रहे। बाद में जब स्थिति सामान्य हुई, तो इस घटना को याद करते हुए असम रेजिमेंट के एक अधिकारी मेजर एम. एफ. प्रॉक्टर ने बदलूराम की याद में यह गीत रचा। गीत की मुख्य पंक्तियां इस प्रकार हैं:"बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है, तो हमें उसका राशन मिलता है।

बदलूराम की तरह ही अनगिनत कथाएं

आज असम रेजिमेंट के जवान इस गीत को गर्व से गाते हैं। गणतंत्र दिवस परेड में असम रेजिमेंट की टुकड़ी जब यह गीत गाती है, तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठता है। सोशल मीडिया पर भी अक्सर असम रेजिमेंट के जवानों द्वारा कदमताल के वक्त गाया जाने वाला यह गीत वायरल होता रहता है। बदलूराम जैसे अनगिनत सैनिकों की गाथाएं ही हमारी सेना को मजबूत बनाती हैं। जैसा कि गीत कहता है। बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है, लेकिन उनका योगदान आज भी "राशन" की तरह साथियों को पोषित कर रहा है।