
लोक सभा में नरेंद्र मोदी सरकार की इतनी बड़ी हार पहली बार हुई है। भाजपा इसे अवसर में बदलने में कितनी कामयाब होगी, यह 4 मई को पता चलेगा। (Photo Source: AI)
लोक सभा में सरकार द्वारा पेश 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर गया है। 12 साल में सदन में मोदी सरकार की यह सबसे बड़ी हार है। जीत की गारंटी तो पहले से नहीं थी, लेकिन जब हार पक्की दिखाई देने लगी तब भी सरकार ने पीछे हटने (बिल वापस लेने) का फैसला नहीं किया। असल में इस हार में भी सरकार के लिए जीत का संकेत है। संभव है, इस संकेत को समझते हुए ही सरकार ने विधानसभा चुनावों के बीच में यह कदम चला हो।
सभी जानते हैं कि असल में महिला आरक्षण के लिए कानून की जरूरत ही नहीं थी। अगर पार्टियां महिलाओं को टिकट देने में उदारता दिखाने लगें तो आरक्षण का मकसद (सदन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना) अपने आप पूरा हो जाएगा। लेकिन यह उदारता कभी नहीं दिखाई दी। इस बीच आरक्षण का मुद्दा उठता और गरमाता रहा। अंततः कानून भी बन गया।
2023 में मोदी सरकार ने कानून बना कर विधायिका में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित किए जाने की व्यवस्था करा दी। लेकिन, इसमें भी शर्त लगा दी गई। नई जनगणना के आधार पर जब संसदीय सीटों का परिसीमन हो जाएगा तब यह आरक्षण लागू होगा। इस शर्त के हिसाब से 2023 में बनाए कानून का असर 2034 के चुनाव में दिख सकता है। इसका एक मकसद यह था कि आरक्षण मौजूदा सीटों में से नहीं मिले। सीटें बढ़ें और उस आधार पर 33 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षित हो।
मोदी सरकार ने महिलाओं पर केंद्रित कई कानून बनाए और योजनाएं चलाईं। तीन तलाक का कानून और उज्ज्वला योजना बड़े उदाहरण हैं। इनकी वजह से महिला लाभार्थियों का एक बड़ा वोट बैंक विकसित हुआ। इसका फायदा उसे चुनावों में हुआ। लिहाजा बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियां राज्यों में भी हर चुनाव से पहले महिलाओं के बैंक खाते में पैसे डालने वाली योजना किसी न किसी रूप में घोषित की जाती रही है। हालिया उदाहरण बिहार का है, जहां महिलाओं को कारोबार शुरू करने के नाम पर दो लाख रुपये तक की रकम देने की योजना चुनाव से कुछ ही समय पहले शुरू की गई थी।
अभी हो रहे या हो चुके पांच विधानसभा चुनावों में भी महिला वोटर्स पर बीजेपी की खास नजर है। पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। मुस्लिम और महिला पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के दो प्रमुख वोट बैंक माने जाते हैं।
पश्चिम बंगाल में 112 सीटें ऐसी हैं जहां 27 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स हैं। 2021 के चुनाव में मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी की स्ट्राइक रेट 95 प्रतिशत थी, जबकि हिन्दू बहुल सीटों पर 60 फीसदी। बीजेपी के लिए यह आंकड़ा क्रमशः 4 और 40 प्रतिशत था।
मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) से कई इलाकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम बाहर हुए हैं। संभवतः इसका फायदा भाजपा को मिले। फिर, वह घुसपैठ का मुद्दा उठाकर मुस्लिमों पर निशाना साध रही है। लेकिन, महिला वोटर्स को लुभाने के लिए कोई मजबूत दांव उसे समझ नहीं आ रहा था। महिला आरक्षण के नाम पर उसकी यह कमी पूरी हो सकती है। लोक सभा में हार को इस रूप में जीत के तौर पर बीजेपी देख सकती है।
भाजपा निश्चित रूप से पश्चिम बंगाल (और तमिलनाडु में भी) की महिला वोटर्स को यह समझाने की कोशिश करेगी कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सहित पूरे विपक्ष ने लोक सभा में मोदी सरकार के लाए आरक्षण बिल को पास नहीं होने दिया। इसका संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन जैसे बड़े नेता दे भी चुके हैं।
पिछला पश्चिम बंगाल चुनाव तो महिला की थीम पर ही लड़ा गया था। टीएमसी ने जहां नारा दिया था 'बंगाल को अपनी बेटी चाहिए', वहीं भाजपा ने भी कहा था, 'अबकी बार महिला, अबकी बार भाजपा'। मैदान में कुल 11 प्रतिशत (240) महिला उम्मीदवार थीं और विधानसभा में 14 प्रतिशत (40) विधायक बन कर पहुंचीं। टीएमसी ने 291 में से 50 सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया था। इस बार भी महिला चुनाव के केंद्र में है।
Updated on:
18 Apr 2026 12:15 pm
Published on:
18 Apr 2026 11:59 am
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