
महिला आरक्षण पर सरकार की नई पहल को विपक्ष चुनावी चाल बता रहा है। (Photo Source: AI)
Women Reservation Bill India: केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल को लोक सभा में महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन आयोग गठित किए जाने से संबन्धित बिल पेश किए। इनका मकसद लोक सभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण थोड़ा जल्दी लागू करना है। यह कानून तो 2023 में ही बन चुका है, लेकिन मौजूदा कानून के मुताबिक आरक्षण नया परिसीमन लागू होने के बाद अमल में आएगा। अब सरकार चाहती है कि लोक सभा में सीटों की संख्या 850 करके महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का लाभ तत्काल दे दिया जाए।
विपक्ष का कहना है कि सरकार चुनावी फायदा लेने के लिए अभी संसद के विशेष सत्र में यह संशोधन विधेयक लेकर आई है। बता दें, पश्चिम बंगाल (23 और 29 अप्रैल) और तमिलनाडु (23 अप्रैल) में वोटिंग अभी होनी है। सरकार ने 2023 में भी महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) नए चुनाव से कुछ महीने पहले ही पारित करवाया था।
विधायिका में महिलाओं को आरक्षण देने का मुद्दा आज का नहीं है। 2023 में भाजपा ने सैद्धांतिक रूप से इस मुद्दे को खत्म कर दिया था, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसके अमल को लेकर पार्टियों ने अपने स्तर पर सक्रियता नहीं दिखाई है।
| चुनाव वर्ष | महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत (%) |
| 1957 | ~3% |
| 1962 | ~3% |
| 1967 | ~3% |
| 1971 | ~2% (सबसे कम) |
| 1977 | ~3% |
| 1980 | ~3% |
| 1984 | ~3% |
| 1989 | ~3% |
| 1991 | ~4% |
| 1996 | ~4% |
| 1998 | ~6% |
| 1999 | ~6% |
| 2004 | ~7% |
| 2009 | ~7% |
| 2014 | ~8% |
| 2019 | ~9% |
| 2024 | ~10% (सबसे अधिक) |
यहां तक कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित होने के शोर के बीच हुए 2024 के लोक सभा चुनाव में भी पार्टियों ने अपनी ओर से पहल करते हुए महिलाओं को एक-तिहाई टिकट देने से परहेज ही किया। जब टिकट ही नहीं मिलेगा तो महिलाएं जीतेंगी क्या? ऊपर दिए गए टेबल के आंकड़े देखिए तो पता चलेगा कि लोक सभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत दहाई अंक में पहली बार 2024 में पहुंचा।
2024 के लोक सभा चुनाव में किस पार्टी ने कितनी महिलाओं पर भरोसा किया, वह इस टेबल से समझा जा सकता है:
| राजनीतिक दल (Political Party) | राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय पार्टी | महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत (%) |
| NPP (नेशनल पीपुल्स पार्टी) | राष्ट्रीय (National) | 67% (सबसे अधिक) |
| BJD (बीजू जनता दल) | राज्य (State) | 33% |
| RJD (राष्ट्रीय जनता दल) | राज्य (State) | 29% |
| AITC (अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस) | राज्य (State) | 25% |
| SP (समाजवादी पार्टी) | राज्य (State) | 20% |
| BJP (भारतीय जनता पार्टी) | राष्ट्रीय (National) | 16% |
| YSRCP (युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी) | राज्य (State) | 16% |
| CPI (M) (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया - मार्क्सवादी) | राष्ट्रीय (National) | 13% |
| INC (इंडियन नेशनल कांग्रेस) | राष्ट्रीय (National) | 13% |
| DMK (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) | राज्य (State) | 14% |
| SS (UBT) (शिवसेना - उद्धव बालासाहेब ठाकरे) | राज्य (State) | 10% |
| BSP (बहुजन समाज पार्टी) | राष्ट्रीय (National) | 8% |
| CPI (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) | राज्य (State) | 7% |
| AIFB (ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक) | राज्य (State) | 3% |
| AIADMK (ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) | राज्य (State) | 3% (सबसे कम) |
| AAP (आम आदमी पार्टी) | राष्ट्रीय (National) | 0% (सबसे कम) |
महिलाओं को खुल कर टिकट नहीं दिए जा रहे हैं। यही कारण है कि अब तक 18 बार लोक सभा के चुनाव हो चुके हैं, लेकिन महिला सांसदों की संख्या 5-15 फीसदी के बीच ही रही है।
लोकसभा | महिला सांसदों का प्रतिशत (%) |
| पहली (1st) | ~4.9% |
| दूसरी (2nd) | ~4.8% |
| तीसरी (3rd) | ~7.2% |
| चौथी (4th) | ~6.0% |
| पाँचवीं (5th) | ~5.0% |
| छठी (6th) | ~3.8% (सबसे कम) |
| सातवीं (7th) | ~5.8% |
| आठवीं (8th) | ~8.3% |
| नौवीं (9th) | ~5.2% |
| दसवीं (10th) | ~7.8% |
| ग्यारहवीं (11th) | ~7.5% |
| बारहवीं (12th) | ~8.0% |
| तेरहवीं (13th) | ~9.5% |
| चौदहवीं (14th) | ~9.3% |
| पंद्रहवीं (15th) | ~10.9% |
| सोलहवीं (16th) | ~11.2% |
| सत्रहवीं (17th) | ~14.9% |
| अठारहवीं (18th) | ~15.5% (सबसे अधिक) |
हमारे यहां महिला सांसद 20 प्रतिशत भी नहीं हैं, वहीं कई देशों में यह आंकड़ा 45 पार भी है। इस टेबल में देखिए:
| देश (Country) | महिला सांसदों का प्रतिशत (%) |
| स्वीडन (Sweden) | 46% (सबसे अधिक) |
| नार्वे (Norway) | 46% (सबसे अधिक) |
| दक्षिण अफ्रीका (South Africa) | 45% |
| ऑस्ट्रेलिया (Australia) | 38% |
| फ्रांस (France) | 38% |
| जर्मनी (Germany) | 35% |
| यूके (UK) | 35% |
| कनाडा (Canada) | 31% |
| यूएस (US) | 29% |
| बांग्लादेश (Bangladesh) | 21% |
| ब्राजील (Brazil) | 18% |
| भारत (India) | 15% |
| जापान (Japan) | 10% (सबसे कम) |
महिलाओं को कम टिकट देने के आरोपों के जवाब में अक्सर पार्टियों का तर्क होता है कि वे जीत की संभावनाओं को देखते हुए उम्मीदवार तय करती हैं। लेकिन, आंकड़े उनके इस तर्क को कमजोर बताते हैं।
पीआरएस लेजिस्लेटिव ने 2019 के लोक सभा चुनाव में लड़ने और जीतने वाली महिलाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पाया कि महिलाओं के चुनाव जीतने का रिकॉर्ड खराब नहीं था। आप भी देखिए:
| पार्टी | चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीदवार | जीतने वाली महिला उम्मीदवार (%) |
| TMC | 37% | 41% |
| BJD | 33% | 42% (सबसे अधिक) |
| YSRCP | 16% | 18% |
| BJP | 13% | 14% |
| INC | 13% | 12% |
| Shiv Sena | 12% | 6% |
| DMK | 8% | 8% |
| JD(U) | 8% | 6% |
महिला आरक्षण पर बहस कोई पुरानी नहीं है। संविधान सभा में भी इस पर बहस हुई थी। तब कई महिलाओं ने ही इसका विरोध किया था। यह कहते हुए कि आजाद भारत में महिलाएं अपनी काबिलियत के दम पर अपनी उचित भागीदारी सुनिश्चित करेंगी। लेकिन, आगे चल कर विधायिका में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने का विचार ज़ोर पकड़ा। 1996 में एचडी देवगौड़ा की सरकार में इस बारे में बिल पेश हुआ। तब बीजेपी का एक धड़ा इसके विरोध में था। कांग्रेस व वामपंथी पार्टियां समर्थन में थीं।
उमा भारती ने ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण (कोटा के भीतर कोटा) मांगा। उस दौर में नीतीश भी कुछ ऐसी ही वकालत किया करते थे। उन्होंने कहा था, 'आज 39 महिला सांसदों में से केवल 4 ओबीसी वर्ग से आती हैं। महिलाओं की आबादी 50 प्रतिशत और ओबीसी की 60 प्रतिशत है। पर क्या कोई ओबीसी महिलाओं की बात कर रहा है?
1997 में इस मसले पर लोक सभा में बहस के दौरान शरद यादव (तब जनता दल के सांसद) ने कहा था, 'कौन महिला है, कौन नहीं है, केवल पर कटी महिला भर नहीं रहने देंगे।'
1998 में अटल सरकार ने जब महिला आरक्षण बिल पेश किया तो विरोधियों ने इसकी प्रतियां फाड़ कर विरोध जताया। जयललिता ने तब कहा था कि मर्द केवल महिला आरक्षण की बातें करते हैं, असल में वे इसे देना नहीं चाहते।' जबकि, कांग्रेस ने खुल कर बिल का समर्थन किया था और सोनिया गांधी ने इसे 'राजीव का सपना' तक करार दिया था। टीएमसी भी बिल के समर्थन में थी। लेकिन, वाजपेयी सरकार गिर गई और बिल ठंडे बस्ते में चला गया।
2008 में यूपीए सरकार ने एक बार फिर पहल की और सदन में बिल पेश किया। शरद यादव ने फिर विरोध किया। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी विरोध में थे। उन्होंने बिल को 'खतरनाक और साजिश' तक करार दिया। लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान ने सुझाव दिया कि एक-तिहाई सीट बढ़ा कर महिलाओं को आरक्षण दे दिया जाए। लालू यादव कोटे के अंदर कोटा मांग रहे थे। उनका कहना था कि मुस्लिम, पिछड़ी और गरीब महिलाओं को संसद में लाना जरूरी है।
2010 आते-आते नीतीश का रुख बदला। उन्होंने बिल का समर्थन किया। 9 मार्च, 2010 को सात सांसदों ने एक बार फिर बिल फाड़ दिया और सभापति के आसन पर धावा बोलने की कोशिश की। उन्हें मार्शल के द्वारा बाहर किया गया। इनमें राजद, सपा, लोजपा के सांसद थे। इनके विरोध के बावजूद राज्य सभा से बिल पास हो गया। लेकिन, दोनों सदनों से पास नहीं हो सका और बिल अटका ही रह गया।
2023 आते-आते महिलाएं एक बड़ा वोट बैंक बन गईं। उनके खिलाफ बात करना अब किसी भी राजनीतिक दल के लिए जोखिम भरा हो गया था। लिहाजा लगभग सभी ने (एआईएमआईएम को छोड़ कर) बिल का समर्थन किया। भले ही अपनी ओर से कुछ असंतोष भी जता दी। जैसे- कांग्रेस ने कहा कि ओबीसी सब-कोटा के साथ बिल को तुरंत अमल में लाया जाए।
Updated on:
16 Apr 2026 06:25 pm
Published on:
16 Apr 2026 06:22 pm
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