
इस तरह 20 मीटर की टंकी में भरकर रखा जाता है जला ऑयल।
गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों ने बढ़ाई दिहाड़ी मजदूरों की परेशानी, वैकल्पिक संसाधनों का जुगाड़ करने कर रहे मशक्कत
नीमच. पेट्रोल-डीजल और गैस सिलेंडर के दाम आसमान पर छूने के बाद ‘दिहाड़ी’ करने वाले लोगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। ईंधन महंगा होने से अधिकांश आवश्यक वस्तुओं के दाम प्रभावित हुए हैं। ऐसे में ‘2 जून’ की रोटी का इंतजाम करने के लिए लोग ‘जुगाड़’ कर रहे हैं।
जले ऑयल से संचालित कर रहे भट्टी
वैवाहिक समारोह हों या भंडारे का आयोजन ईरान-अमेरिका युद्ध शुरु होने के बाद से गैस सिलेंडर को लेकर भारी संकट खड़ा हो गया है। घरेलू सिलेंडर भी ब्लैक में 1500 से 2000 और कमर्शियल सिलेंडर 3000 रुपए प्रति नग में मिलने लगे हैं। इससे हलवाइयों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पडऩे लगा है। इसके विकल्प के रूप में कच्ची मिट्टी की भट्टी का उपयोग शुरू हुआ। लकड़ी की मदद से भोजन तैयार किया गया। इसके साथ ही डीजल की भट्टी का उपयोग एक बार फिर से देखने को मिला। गैस सिलेंडर की समस्या के चलते ढाबों पर फिर से तंदूर दिखाई देने लगे। अब नीमच के एक हलवाई ने स्वयं जुगाड़ बनाकर वाहनों के जले ऑयल से एक भट्टी बनाई है। इससे खर्चा करीब 35 फीसदी तक कम हो गया है।
साढ़े पांच हजार में तैयार होती है भट्टी
हलवाई जगदीश बिहारी ने बताया कि जब से गैस सिलेंडर को लेकर समस्या खड़ी हुई है इसके बाद से उनके सामने भी ‘2 जून की रोटी’ का संकट खड़ा होने लगा था। साथ काम करने वाले लोगों की व्यवस्था जुटाने में परेशानी होने लगी थी। अचानक लागत बढऩे से समस्या खड़ी हो गई है। ऐसे में एक जुगाड़ तैयार किया। स्वयं की सोच से वाहनों के जले ऑयल का उपयोग कर भट्टी तैयार की। भट्टी में एक ब्लोअर लगाया गया है। जो काफी तेजी से चलता है। करीब 20 मीटर जले ऑयल की टंकी में से काफी पतली धार नीचे गिरती है। इस जुगाड़ से जब आर्थिक खर्च कम होने लगा तो धीरे धीरे इनकी संख्या बढ़ाई। एक भट्टी बनाने की औसत लागत साढ़े 5 हजार रुपए है। आज 10 से अधिक बड़ी भट्टियों का उपयोग कर बड़े शादी-समारोह में भोजन तैयार किया जा रहा है। इससे ईंधन का खर्च भी काफी कम हो गया है। सबसे अच्छी बात यह है कि गैस सिलेंडर को लेकर चल रही मारामारी भी लगभग खत्म हो गई है।
Published on:
02 Jun 2026 12:00 pm
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