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पिता ने ऐसा क्यों कहा बेटियां ही बनती हैं बुढ़ापे का सहारा

जिले में एक हजार पुरूषों पर हैं 978 महिलाएं

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तकनीकी इंजीनियर अफीम फैक्ट्री

नीमच. जिले में लिंगानुपात का स्तर बढऩे लगा हे। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि नीमच जिले में वर्ष 2001 की तुलना में वर्ष 2011 में प्रति हजार पुरूषों पर 24 महिलाओं की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2001 में जहां एक हजार पुरूषों पर 954 महिलाएं ही थीं वहीं यह आंकड़ा वर्ष 2011 में बढ़कर 978 तक पहुंच गया है। लोगों के लिए चलाए गए जागरूकता अभियान एवं स्वास्थ्य विभाग की सख्ती के चलते ही लिंगानुपात में यह सुधार सामने आए हैं। जानकारों की माने तो जिले में लिंगानुपात कई कारणों से प्रभावित होता है। इनमें बाल विवाह, सामाज में बालिका जन्म के प्रति दृष्टिकोण, बालिकाओं की शिक्षा, परिवार द्वारा बालिकाओं का पालन पोषण, गर्भवती माताओं को मिलने वाली स्वास्थ्य और पोषण आहार, सुरक्षित प्रसव और शिशु भू्रण परीक्षण आदि कारण प्रमुख हैं।

बढ़ापे में बेटी ही आती हैं आगे
बेटा हो या बेटी कोई फर्क नहीं पड़ता। जहां बुढ़ापे में लड़के अपने माता-पिता को अकेला छोड़ चले जाते हैं। ऐसे में बेटियां की उनका सहारा बनती है। दो परिवारों को संभालने का काम केवल बेटियां की कर सकती हैं। यह काम बेटों के बस का है भी नहीं। यह बेबाक राय उन पिताओं की है जिन्होंने एक बेटी होने के बाद दूसरे बच्चे के बारे में सोचा तक नहीं। वे अपनी बेटियों को ही बेटों की तरह हर सुविधा उपलब्ध कराते हैं।

बकौल धीरेंद्र न कभी मुझे और न ही कभी मेरी पत्नी को ऐसा लगा कि एक और बच्चा होता तो अच्छा होता। इस महंगाई के दौर में हमने एक ही बच्चे की प्लॉनिंग पहले से ही कर ली थी। यह नहीं सोचा था कि बेटा होगा या बेटी। बेटी हुई तो उसे भी सभी खुशियां दे रहे हैं। एक ही बेटी है तो उसका लालन पालन भी बेहतरीन तरीके से कर पा रहे हैं।


बकौल एनएस रुद्रेश हमारे यहां साउथ में बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं देखा जाता। आज जनसंख्या इतनी अधिक हो गई है कि एक बच्चा हो तो ही अच्छा है। देखने में यह आता है कि बुढ़ापे में बेटा अपने माता-पिता को छोड़कर चला जाता है। ऐसे में बेटी ही अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनती हैं। यही मुख्य वजह रही कि हमने कभी बेटे के बारे में नहीं सोचा।

बकौल रामलखन तिवारी हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमारे दो बेटियां है तो एक बेटा भी होना चाहिए। दोनों बेटियों को हम हर खुशी दे रहे हैं। उनकी हर उम्मीदों को पूरा करने में हमें कोई परेशानी नहीं होती। बेटियों के साथ हंसते खेलते दिन कब बीत जाता है पता हीं नहीं चलता। मेरी पत्नी शिक्षिका है। ऐसे में हम दोनों का ही निर्णय यह था कि बेटियों की अच्छी परवरिश करें।

बकौल पंकजसिंह मेरे मन में तो कभी यह बात नहीं आई कि मेरी दो बेटियां है तो एक बेटा भी होना चाहिए। लेकिन जिस समाज में हम रहते हैं वहां महिलाओं की सोच आज भी काफी कमजोर है। यदि महिला दो बेटियों से संतुष्ट भी हो तब भी समाज उन्हें बेटे के बारे में सोचने पर मजबूर कर देता है। आज हमारी दो बेटियां हैं और हम उनके साथ काफी खुश हैं।