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Delhi High Court : दिल्ली हाई कोर्ट ने पोक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि नाबालिग पीड़िता से शादी कर लेना केवल 'जमानत पाने की एक चाल' (Ploy) हो सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा जेल जाने के बाद की गई शादी उसे बलात्कार के गंभीर आरोपों से मुक्त नहीं करती।
आपको बता दें कि इस केस की सुनवाई जस्टिस गिरीश कठपालिया की पीठ कर रही थी। इस दौरान आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह साफ है कि आरोपी ने गिरफ्तारी के बाद ही शादी के लिए सहमति दी थी। अप्रैल 9 को जारी अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने नाबालिग के साथ बार-बार दुष्कर्म किया। जब वह जेल चला गया, तब वह शादी के लिए तैयार हुआ। स्पष्ट है कि यह निकाह केवल जेल से बाहर आने के लिए एक पैंतरे के रूप में किया गया था।
मामले में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब पीड़िता ने खुद आरोपी का समर्थन किया। पीड़िता, जो कि कानून की छात्रा (Law Student) है, ने अदालत में दावा किया कि उसे एफआईआर (FIR) की सामग्री के बारे में पता नहीं था क्योंकि वह उसके वकील ने तैयार की थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह विश्वास करना कठिन है कि कानून की पढ़ाई कर रही एक छात्रा इतनी भोली होगी कि वह बिना पढ़े इतने गंभीर आरोपों वाली शिकायत पर हस्ताक्षर कर दे। कोर्ट ने पीड़िता के इस बयान को प्रथम दृष्टया झूठा माना कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने बयान बदलने पर जेल जाने की धमकी दी गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता के साथ रेप तब हुई थी जब वह केवल 16 साल की थी। फेसबुक पर दोस्ती के बाद आरोपी उसे एक फ्लैट पर ले गया, जहां उसे नशीला पदार्थ पिलाकर कथित तौर पर यौन शोषण किया गया। इतना ही नहीं आरोपी ने पीड़िता को 18 साल की होने पर शादी का झांसा दिया और बार-बार शारीरिक संबंध बनाए। इस दौरान पीड़िता दो बार गर्भवती हुई और गर्भपात कराया गया। जब पीड़िता बालिग हो गई और आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया, तब यह एफआईआर दर्ज कराई गई। गिरफ्तारी के बाद फरवरी 2026 में आरोपी ने जेल में रहते हुए अंतरिम जमानत के दौरान पीड़िता से निकाह किया और फिर इसी आधार पर नियमित जमानत मांगी।
अदालत ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) की इस दलील में दम पाया कि पीड़िता बालिग होने के बाद आरोपी को बचाने के लिए झूठी गवाही दे रही है। कोर्ट ने कहा कि यौन संबंध शुरू होने के समय पीड़िता नाबालिग थी, जो कि कानूनन अपराध है। अभियोजन पक्ष ने यहाँ तक सुझाव दिया कि अदालत में झूठी गवाही देने के लिए पीड़िता के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
Published on:
10 Apr 2026 03:15 pm
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