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‘जिन्न’ भगाने के नाम पर नाबालिग से गंदा काम, दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी मौलवी की जमानत याचिका की खारिज

Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने 'जिन्न' निकालने के बहाने नाबालिग से दुष्कर्म करने वाले मौलवी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने पीड़िता की लाचारी और परिवार के अंधविश्वास का फायदा उठाकर विश्वासघात किया है।

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Delhi High Court

दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी मौलवी की जमानत याचिका की खारिज

Molvi Bail Rejected;दिल्ली हाईकोर्ट ने 'जिन्न' से मुक्ति दिलाने के नाम पर एक नाबालिग लड़की का यौन उत्पीड़न करने वाले आरोपी मौलवी को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी की नियमित जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आरोपी ने न केवल कानून तोड़ा, बल्कि एक परिवार के अटूट विश्वास और उनकी लाचारी का भी घोर अपमान किया है।

अंधविश्वास की आड़ में रची गई घिनौनी साजिश

मामला प्रेम नगर थाने में आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता लंबे समय से बीमार थी। स्वास्थ्य में सुधार न होने पर परिवार को शक हुआ कि उस पर किसी 'जिन्न' का साया है। स्थानीय लोगों की सलाह पर परिवार ने आरोपी मौलवी से संपर्क किया, जिसने झाड़-फूंक के जरिए बीमारी ठीक करने का दावा किया था। आरोप है कि इलाज के बहाने आरोपी घर आने लगा और एक दिन कथित 'बुरी आत्मा' को निकालने के लिए एकांत की मांग करते हुए परिजनों को कमरे से बाहर भेज दिया। इसके बाद उसने नाबालिग को डराया कि जिन्न निकालने के लिए अश्लील हरकतें जरूरी हैं और उसका यौन उत्पीड़न किया। घटना के बाद आरोपी ने लड़की को जुबान खोलने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी।

कोर्ट में दलीलें

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि आरोपी अक्टूबर 2019 से जेल में बंद है और मामले में पीड़िता समेत मुख्य गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। उन्होंने गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने का दावा करते हुए आरोपी को जमानत देने की मांग की। वहीं, सरकारी वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने परिवार के अंधविश्वास और पीड़िता की कमजोर मानसिक स्थिति का फायदा उठाकर उसके साथ बार-बार शोषण किया।

हाईकोर्ट का कड़ा रुख

दिल्ली हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि पीड़िता ने धारा 164 के बयानों और ट्रायल कोर्ट की गवाही में अपने आरोपों को स्पष्ट रूप से दोहराया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जमानत के स्तर पर सबूतों की विश्वसनीयता की सूक्ष्म जांच नहीं की जा सकती, यह ट्रायल का विषय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति ने विश्वास का ऐसा गलत फायदा उठाया हो, वह इस चरण पर जमानत का हकदार नहीं है।