
Delhi High Court : दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि केवल अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने के कारण किसी वकील को गवाह नहीं माना जा सकता। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक अधिवक्ता को नोटिस जारी किया, जिस पर कोर्ट ने रोक लगाते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा सकती है। यह मामला न सिर्फ वकीलों के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि जांच एजेंसियों की सीमाओं को भी स्पष्ट करता है। हाईकोर्ट यह सुनवाई अधिवक्ता सचिन बाजपेयी की याचिका पर कर रहा था, जिसमें उन्होंने सीबीआई के उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनसे अपने मुवक्किल से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने और व्यक्तिगत रूप से बयान दर्ज कराने को कहा गया था। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के खिलाफ है।
सीबीआई ने 21 नवंबर 2025 को मैसर्स लॉर्ड महावीर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की थी। आरोप था कि साइबर अपराधों में सिम कार्ड के दुरुपयोग के जरिए आपराधिक गतिविधियां की गईं। एफआईआर का नंबर RC2212025E0016 है। इस मामले में कंपनी के एक निदेशक ने 5 दिसंबर को कानूनी सलाह और प्रतिनिधित्व के लिए अधिवक्ता सचिन बाजपेयी से संपर्क किया। इसके बाद कंपनी ने जांच में सहयोग के तहत कुछ दस्तावेज सीबीआई को सौंपने की कोशिश की। आरोप है कि जब कंपनी के कर्मचारी ये दस्तावेज लेकर सीबीआई कार्यालय पहुंचे तो जांच अधिकारी (IO) ने उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। ऐसी स्थिति में अधिवक्ता सचिन बाजपेयी ने 15 दिसंबर को अपनी पेशेवर भूमिका निभाते हुए वही दस्तावेज ईमेल के जरिए जांच अधिकारी को भेज दिए, ताकि जांच में किसी तरह की बाधा न आए।
17 दिसंबर को अधिवक्ता सचिन बाजपेयी ने सत्र न्यायालय से कंपनी के एक निदेशक के लिए अंतरिम सुरक्षा (Interim Protection) हासिल कर ली। इसके ठीक दो दिन बाद 19 दिसंबर 2025 को सीबीआई ने अधिवक्ता को नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में वकील को निर्देश दिया गया कि वे भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 63 (4)(C) के तहत ईमेल से भेजे गए दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां प्रस्तुत करें साथ ही 20 दिसंबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 180 के तहत अपना बयान दर्ज कराएं, क्योंकि वे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित हैं। अधिवक्ता सचिन बाजपेयी ने इसे गलत और कानून के खिलाफ बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि उन्होंने जो भी किया, वह केवल अपने मुवक्किल की ओर से और पेशेवर दायरे में किया गया काम था।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित माथुर और संदीप शर्मा ने कोर्ट में दलील दी कि वकील को सिर्फ इसलिए गवाह नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उसने अपने मुवक्किल के निर्देश पर दस्तावेज जांच एजेंसी को भेजे हैं। उन्होंने कहा कि यह वकील और मुवक्किल के बीच भरोसे के रिश्ते और विशेषाधिकार के खिलाफ है। यह भी तर्क दिया गया कि नोटिस ऐसे समय पर जारी किया गया, जब वकील ने अपने मुवक्किल के लिए अंतरिम सुरक्षा हासिल की थी, जिससे यह कार्रवाई संदिग्ध प्रतीत होती है। वहीं, सीबीआई की ओर से विशेष लोक अभियोजक (SPP) रिपुदमन भारद्वाज ने कोर्ट से जवाब दाखिल करने और नोटिस जारी करने से संबंधित निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता द्वारा भेजे गए ईमेल का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि ईमेल में साफ लिखा था कि दस्तावेज हमारे मुवक्किल मैसर्स लॉर्ड महावीर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की ओर से भेजे जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को पूरी जानकारी थी कि याचिकाकर्ता आरोपी कंपनी के अधिवक्ता हैं। इसके बावजूद उन्हें गवाह के तौर पर बुलाना गलत है। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करना, उसकी ओर से जांच एजेंसी से संवाद करना और जांच में कानूनी सहयोग देना, ये सभी एक अधिवक्ता के पेशेवर कर्तव्य हैं। इन्हें गवाही या पूछताछ के बराबर नहीं रखा जा सकता।” कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Summoning Advocates who give legal opinion or represent parties during investigation of cases (2025 SCC OnLine SC 2320) का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में साफ कहा था कि जांच एजेंसियां सामान्य तौर पर आरोपी का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों को समन नहीं कर सकतीं, जब तक कि कोई विशेष और असाधारण परिस्थिति न हो, और वो भी वरिष्ठ अधिकारी की लिखित अनुमति के साथ।
हाईकोर्ट ने वकील और मुवक्किल के रिश्ते को कानून की बुनियाद बताते हुए कहा कि मुवक्किल अपने मामले से जुड़ी सभी जानकारियां वकील को इस भरोसे के साथ देता है कि वह उसका बचाव करेगा। इसलिए यह स्वाभाविक है कि वकील को मामले के तथ्यों की जानकारी होगी। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि इसका यह मतलब नहीं है कि हर वकील, जो किसी मामले को संभाल रहा है, उसे गवाह बना दिया जाए। जस्टिस शर्मा ने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की प्रथा को अनुमति दी गई, तो इसके दूरगामी और खतरनाक परिणाम होंगे। कोर्ट ने कहा कि इससे वकीलों पर दबाव बनेगा, वे स्वतंत्र रूप से अपने मुवक्किल का बचाव नहीं कर पाएंगे और कानूनी पेशे की आजादी पर गंभीर असर पड़ेगा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर, 2025 को जारी सीबीआई के नोटिस पर याचिका के अंतिम निपटारे तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्टे आवेदन को स्वीकार करते हुए जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई की तारीख 23 दिसंबर, को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित रहें। यह फैसला वकीलों के अधिकारों और जांच एजेंसियों की कार्यशैली के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
Updated on:
23 Dec 2025 12:05 pm
Published on:
22 Dec 2025 09:54 pm
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