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PFI नेता की बढ़ीं मुश्किलें, दिल्ली कोर्ट ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के मामले में ट्रायल का दिया आदेश

PFI leaders trial Delhi court: देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और 2047 तक भारत में 'इस्लामिक खिलाफत' स्थापित करने की साजिश के मामले में PFI के संस्थापक ई. अबूबकर समेत 20 नेताओं पर आरोप तय। NIA कोर्ट ने 29 जुलाई से ट्रायल शुरू करने का दिया आदेश।
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Court PFI chargesheet

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PFI waging war against India: प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और उसके शीर्ष नेताओं की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट स्थित विशेष एनआईए (NIA) अदालत ने शनिवार को पीएफआई के संस्थापक अध्यक्ष ई. अबूबकर सहित 20 सदस्यों और स्वयं संगठन के खिलाफ देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामले में औपचारिक रूप से आरोप तय कर दिए हैं।

अदालत ने अब इस मामले को नियमित ट्रायल (मुकदमे) के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। सभी आरोपियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है और ट्रायल का सामना करने की बात कही है, जिसके बाद कोर्ट ने एनआईए को 29 जुलाई से अपने सबूत और गवाह पेश करने के निर्देश दिए हैं।

इन गंभीर धाराओं में तय किए गए आरोप

इससे पहले 5 जून को विशेष एनआईए न्यायाधीश प्रशांत शर्मा ने पीएफआई और उसके 20 पदाधिकारियों, जिनमें संगठन के संस्थापक अध्यक्ष ई. अबूबकर और तत्कालीन अध्यक्ष ओमा सलाम शामिल हैं, के खिलाफ आरोप तय करने का निर्देश दिया था। इन सभी पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आपराधिक साजिश रचने, भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने, आतंकी संगठनों के लिए धन जुटाने, आतंकी प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने और युवाओं की आतंकी गतिविधियों के लिए भर्ती करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मामले में एनआईए की ओर से विशेष लोक अभियोजक राहुल त्यागी, सहायक लोक अभियोजक जतिन खत्री और अमित रोहिल्ला ने पक्ष रखा, जबकि आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. बालन, ए. नौफल और सैपन दस्तगीर ने अदालत में पैरवी की।

'साल 2047 तक भारत में इस्लामिक खिलाफत स्थापित करने की थी साजिश'

मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए विशेष अदालत ने 5 जून को अपने आदेश में एक बेहद चौंकाने वाली टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि 'रिकॉर्ड पर मौजूद तमाम सबूतों और सामग्रियों को समग्र रूप से देखने पर यह गहरा संदेह पैदा होता है कि इन आरोपियों ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उसकी राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (NEC) के माध्यम से एक सुनियोजित साजिश के तहत काम किया। इनका उद्देश्य हथियारों के बल पर संघर्ष करके भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकना था, ताकि वर्ष 2047 या उससे पहले भारत में शरिया कानून के तहत एक 'इस्लामिक खिलाफत' (Islamic Caliphate) स्थापित की जा सके।'

क्या है पूरा मामला?

केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 13 अप्रैल 2022 को नई दिल्ली में आईपीसी की धारा 120-बी, 153-ए और यूएपीए (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। जांच एजेंसी का आरोप है कि पीएफआई और उसके नेता देश की चुनी हुई सरकार को पलटने की योजना बना रहे थे। इसके लिए वे देश के युवाओं को कट्टरपंथी बना रहे थे और विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा दे रहे थे। एनआईए के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कई वरिष्ठ नेता भी इन आतंकियों की 'हिट लिस्ट' में शामिल थे।

इस सिलसिले में सितंबर 2022 में सुरक्षा एजेंसियों ने देशव्यापी छापेमारी (Nationwide Crackdown) कर पीएफआई के इन शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार किया था। इसी कार्रवाई के बाद केंद्र सरकार ने पीएफआई को एक गैरकानूनी और प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया था। एनआईए ने मामले की गहन जांच के बाद कोर्ट में चार्जशीट और सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की थी, जिस पर अब ट्रायल शुरू होने जा रहा है।

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