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भारत की पहली डिजिटल लोक अदालत शुरू हुई राजस्थान में, दूर-दराज के लोगों को मिलेगा जल्द न्याय

आधुनिक तकनीकी की मदद से डिजिटल लोक अदालत की देश में ऐसी अनूठी पहल शुरू की गई है। इससे दूर-दराज के इलाकों तक न्याय जल्दी और आसानी से पहुंचेगा। वर्ना वर्षों ही नहीं दशकों तक अदालतों में मुकदमे लटके रहना आम बात है। आंकड़े बताते हैं कि जितने मामले कोर्ट में लटके हैं उन्हें निपटाने में 324 साल का समय लगेगा।
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नई दिल्ली

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Patrika Desk

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Updated: 21 Jul 2022, 6:25 PM IST

भारत की पहली डिजिटल लोक अदालत शुरू हुई राजस्थान में, दूर-दराज के लोगों को मिलेगा जल्द न्याय

भारत की पहली डिजिटल लोक अदालत शुरू हुई राजस्थान में, दूर-दराज के लोगों को मिलेगा जल्द न्याय

राजस्थान को भारत की पहली एआई आधारित आधुनिक डिजिटल लोक अदालत की सौगात मिल गई है। न्याय प्रणाली की मौजूदा समस्याओं को हल करने के लिए गहन अनुसंधान के बाद डिजिटल लोक अदालत की अवधारणा डिज़ाइन और विकसित की है, ताकि यह सुनिश्चित चकिया जा सके कि वेब, मोबाइल और सीएससी के ज़रिए देश के दूर-दराज के इलाकों तक भी न्याय पहुंचें तथा अन्य सेवाओं की तरह न्याय को किफ़ायती बनाया जा सके।

राजस्थान राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के टेक्नोलॉजी पार्टनर ज्युपीटाईस टेक्नोलॉजीज़ ने इस डिजिटल लोक अदालत की डिज़ाइन और अवधारणा विकसित की है। इसका उद्घाटन भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, कानून एवं न्याय मंत्री किरण रीजीजू और राजस्थान के माननीय मुख्य मंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में किया गया।

डिजिटल लोक अदालत के माध्यम से पुराने लंबित मामलों का निपटान किया जा सकेगा या ऐसे मामलों को भी आसानी से निपटाया जा सकेगा जो राजस्थान राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण में आरंभिक चरण में हैं। इससे विवाद निपटान की प्रक्रिया आधुनिक बनेगी, जहां आवेदन के ड्राफ्ट और फाइलिंग से लेकर एक क्लिक पर ई-नोटिस जनरेशन, स्मार्ट टैम्पलेट, ड्राफ्ट सैटलमेन्ट समझौता और वीडियो-कॉन्फ्रैंसिंग के ज़रिए डिजिटल सुनवाई तक सभी पहलुओं को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा यह एआई-पावर्ड वॉइस-बेस्ड इंटरैक्टिव चैटबोट भी उपलब्ध कराएगा, जहां आधुनिक डेटा एनालिटिक्स टूल्स, लोक अदालत की सुगम कार्रवाई को सुनिश्चित करने में मदद करेंगे। इसमें डेटा उन्मुख फैसलों के लिए कस्टम रिपोर्ट और बीआई डैशबोर्ड का उपयोग किया जाएगा।

हाल ही के वर्षों में भारत में कानूनी मामलों का लंबित रहना सुर्खियों में रहा है। खासतौर पर महामारी के दौरान स्थिति और भी बदतर हो गई, जब अदालतों की कार्रवाई रुक सी गई थी। हाल ही में बिहार के ज़िला न्यायालय ने 108 सालों के बाद एक विवादित जम़ीन के मामले में फैसला सुनाया, यह देश के सबसे पुराने लंबित मामलों में से एक है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के सभी मामलों का निपटान करने में तकरीबन 324 सालों का समय लगेगा। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 75 से 97 फीसदी न्यायिक समस्याएं अदालत तक कभी पहुंचती ही नहीं हैं, यानि 5 मिलियन से 40 मिलियन मामले प्रति माह अदालत तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में तकनीकी हस्तक्षेप द्वारा भारत में विवादों की निपटान की इस गंभीर स्थिति को जल्द से जल्द हल करना बेहद ज़रूरी है।

राजस्थान राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस महिन्द्रा मोहन श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘130 करोड़ लोगों के देश में जहां आज भी बड़ी संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं तथा समाज के वंचित समुदायों से ताल्लुक रखते हैं, सभी को न्याय मिलना एक बड़ी चुनौती है।’

हाल ही में आरएसएलएसए और ज्युपीटाईस ने एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे, जहां ज्युपीटाईस ने टेक्नोलॉजी पार्टनर के रूप में आरएसएलएसए को कस्टमाइज़्ड डिजिटल लोक अदालत प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया। जसटेक (जस्टिस टेक्नोलॉजी) कंपनी-ज्युपीटाईस देश के विभिन्न अर्ध-न्यायिक संस्थानों और एडीआर सेंटरों के साथ काम कर रही है ताकि विवादों के निपटान के लिए डिजिटल प्रणाली को अपनाया जा सके।

दुनिया भर में न्याय प्रणाली को जटिल माना जाता है। न्याय की पूरी प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति पर तनाव बना रहता है, इसक अलावा इसमें बहुत अधिक पैसा और समय भी खर्च होता है। ओईसीडी की एक रिपोर्ट के अनुसार इन विपरीत प्रभावों के चलते लोगों के स्वास्थ्य, आय और रोज़गार को जो नुकसान होता है, वह ज़्यादातर देशों के जीडीपी का 0.5 फीसदी से 3 फीसदी हिस्सा बनाता है। एक देश के समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिए न्याय को सुलभ बनाने के साथ-साथ न्याय के अनुभव को भी बेहतर बनाना ज़रूरी है ताकि हर मामले को ठीक से निपटाया जा सके।