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मौत के करीब 55 साल बाद भी गश्त करता है भारतीय सैनिक

-भारत चीन सीमा पर नाथुला के निकट बना है बाबा हरभजन मंदिर -सेना के जवान करते हैं पूजा-अर्चना, चीनी फौजी भी नवाते हैं शीश

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मौत के करीब 55 साल बाद भी गश्त करता है भारतीय सैनिक

मौत के करीब 55 साल बाद भी गश्त करता है भारतीय सैनिक

सुरेश व्यास

नाथू ला (सिक्किम)। विज्ञान और तकनीक के युग में मौत के 55 साल बाद भी किसी फौजी के गश्त करने की बात अविश्वसनीय लगे, लेकिन भारत-चीन सीमा पर तैनात सेना के जवान और यहां आने वाले पर्यटक भी इस तथ्य से इनकार नहीं करते। इतना ही नहीं, सेना की ओर से इस फौजी को अब से पांच बरस पहले तक सेवारत मानते हुए बाकायदा उनके नाम पर छुट्टियां मंजूर कर इनकी यात्रा के इन्तजाम तक किए जाते रहे। सेना ने इन्हें साल 2017 में सेवानिवृत्त मान लिया, लेकिन इलाके में तैनात सैनिक मानते हैं कि बाबा अब भी 'दुश्मन' पर नजर रखते हैं। इसी आस्था के चलते सेना के जवान अग्रिम मोर्चे पर बने मंदिर में इनकी पूजा-अर्चना करते हैं तो बातचीत के लिए भारतीय इलाके में आने वाले चीनी फौजी भी इनके सम्मान में सिर झुकाते हैं।

ये फौजी हैं बाबा हरभजन सिंह। 30 अगस्त 1946 को पंजाब में गुजरावालां (वर्तमान में पाकिस्तान) के सदराना गांव में जन्मे हरभजन 9 फरवरी 1966 को भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में सिपाही के रूप में भर्ती हुए। दो साल बाद उनकी तैनाती पूर्वी सिक्किम के दुर्गम इलाके में हुई। खच्चरों का काफिला तुकुला से डोंगयुई ले जाते समय 4 अक्टूबर 1968 को नाथु-ला के पास पैर फिसल जाने से वे नाले में गिर गए और उनकी मृत्यु हो गई। शव पानी के तेज बहाव में नौ किलोमीटर आगे तक बह गया। काफी दिनों तक उनका पता नहीं चला तो फौज ने उन्हें एक तरह से भगौड़ा घोषित कर दिया।

1982 से हो रही है मंदिर में पूजा

बाबा के मंदिर की पूजा कर रहे एक सैनिक व वहां तैनात अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर किवदंती के हवाले से कहा कि हरभजन ने साथी सिपाहियों के सपने में आकर शव पड़ा होने की सूचना दी। पहले तो इस पर किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन जब सेना के अधिकारी बताए गए स्थान पर पहुंचे तो वहां शव व पास रहने वाले हथियार मिल गए। बाबा के कहे अनुसार वहां उनकी समाधि भी बनाई गई। बाद में 11 नवम्बर 1982 को जेलेप और नाथुला दर्रों के बीच उनका मंदिर बनवाया गया। इसकी सेना देखरेख करती है। सैनिक मानते हैं कि बाबा अब भी इलाके में ड्यूटी निभाते हैं और सीमा पार गतिविधियां साथियों को सपने में आकर देते हैं। मंदिर के पास ही एक कमरे में हरभजन का दफ्तर व दूसरे में उनका लिविंग रूम बना है। वहां रखे जूते कई बार कीचड़ से सने मिलने की बात जवान मानते हैं।

अलग से रखते हैं कुर्सी

बाबा को ऑनरेरी कैप्टन का दर्जा दिया गया और उन्हें बाकी सभी सैनिकों की तरह वेतन, दो महीने की छुट्टी आदि सुविधाएं जारी रखी गई। छुट्टी के दौरान ट्रेन में उनके नाम की बुकिंग होती है। दो सिपाही लिविंग रूम में रखी तस्वीर के साथ उनके गांव तक ले जाते और वापस लाते हैं। इतना ही नहीं नाथु ला में भारत-चीन के सैन्य अधिकारियों की बैठक के दौरान भी बाबा हरभजन के लिए एक कुर्सी अलग से लगाई जाती है।

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