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ऑनलाइन गेमिंग और मोबाइल ने उड़ाई नींद…अस्पतालों में 100 से ज्यादा मामले देख डॉक्टर हैरान

Online Game Addiction: सोशल मीडिया का ये दौर बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता को पूरी भंग कर रहा है। मोबाइल में ऑनलाइन गेम्स की लत दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। शहर के अस्पतालों में रोजाना 100 के ज्यादा मामले गेम्स की लत के आ रहे हैं।

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Online Game Addiction: सोशल मीडिया जहां देश-दुनिया की हमें जानकारी दे रहा है, वहीं बच्चों का बचपन अंधेरे में है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम बच्चों की दिनचर्या ही नहीं बिगाड़ रहे, बल्कि उन्हें अकेलेपन और अवसाद की गर्त में ढकेल रहे हैं। इसका जीता-जागता प्रमाण उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या है। इन तीनों बहनों ने सुसाइड नोट में कोरियन लव की बातें कहीं हैं। इसका अनुभव उन्हें ऑनलाइन गेमिंग के दौरान हुआ था। दूसरी ओर, अस्पतालों में ऐसे मरीजों की बाढ़ आ गई है, जो मेम्स की लत से परेशान हैं।

गाजियाबाद में तीन बहनों ने खत्म कर ली जिंदगी

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बुधवार को मोबाइल पर कोरियन लव गेम की लत ने तीन नाबालिग बहनों की जान ले ली। तीनों बहनों ने रात करीब दो बजे अपनी सोसायटी की नौंवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी। इस घटना ने अभिभावकों के होश उड़ा दिए हैं। यह अकेले किसी एक इलाके की त्रासदी नहीं है, गाजियाबाद के नजदीकी जिले फरीदाबाद में भी इसका असर देखा जा रहा है, जहां बड़ी संख्या में बच्चे मोबाइल फोन और ऑनलाइन गेम्स के आदी होते जा रहे हैं। शहर में ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज समेत करीब 15 बड़े अस्पताल हैं। जहां रोजाना करीब 100 ऐसे बच्चे और किशोर पहुंच रहे हैं, जो ज्यादातर ऑनलाइन गेमिंग की लत से परेशान हैं।

असल दुनिया से गायब हैं बच्चे

ग्रेटर फरीदाबाद स्थित एकॉर्ड अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. सिमरन मलिक ने बताया कि अस्पताल में आने वाले ज्यादातर बच्चों में ऑनलाइन गेमिंग के कारण पढ़ाई में मन न लगना, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएं दिख रही हैं। वहीं बच्चों में अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और आत्मघाती विचार तक दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि ऑनलाइन गेम्स में हार- जीत की लड़ाई बच्चों के मन पर इतना गहरा असर डाल रही है कि एक मामूली से खेल को बच्चे जीवन की सबसे बड़ी हार मान ले रहे हैं और खुद को नाकाम समझने लगते हैं। जिसके चलते वे धीरे-धीरे असल दुनिया के दूरी बना लेते हैं।

अभिभावकों को जागरूक होने की जरूरत

इसके लिए मोबाइल या गेम्स पूरी तरह बंद कर देना इसका इलाज नहीं हैं। बल्कि समय- सीमा तय करना जरूरी है। साथ ही अभिभावकों अपने बच्चों के साथ रोज बातचीत करनी चाहिए, उनके साथ समय बिताना चाहिए और खेल-कूद व कलाकारी करने के लिए दिलचस्पी दिखानी चाहिए ताकि बच्चे खुलकर मन की बात कर सकें, अकेले घुटते नहीं रहें। यदि बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखे तो देर न करें और किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें। डॉ. अंकुर ने कहा कि पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स, समय-सीमा तय करने वाले टूल्स और सुरक्षित ब्राउजिंग सेटिंग्स का उपयोग अभिभावकों को जरूर करना चाहिए।

गेम की लत का पता लगाएगा AIIMS का टूल

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स (AIIMS) ने एक ऐसा टूल बनाया है जिसके उपयोग से ये पता लगाया जा सकता है कि इंटरनेट और ऑनलाइन गेम की लत का रिस्क स्कोर कितना है। साथ ही यह भी पता लगाएगा कि चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन जैसी समस्याएं गेमिंग लत की वजह से हैं? ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. अंकुर सचदेवा ने बताया कि डिजिटल गेम्स की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों में आ रहा चिड़चिड़ापन

अस्पताल में हर महीने 5 से 6 बच्चे और किशोर मानसिक परेशानी के इलाज के लिए पहुंच रहे हैं, जिनमें से करीब दो बच्चे मोबाइल और गेम्स की ज्यादा लत से जूझ रहे होते हैं। लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन और ध्यान की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बच्चे पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं और नींद व खानपान का संतुलन भी बिगड़ जाता है। उन्होंने बताया कि बच्चे अक्सर अपनी परेशानी शब्दों में नहीं कह पाते, बल्कि व्यवहार से संकेत देते हैं। अचानक ज्यादा चुप रहना, अकेले रहना पसंद करना, दोस्तों से दूरी बनाना और छोटी बातों पर गुस्सा होना मानसिक दबाव के लक्षण हो सकते हैं।

अभिभावकों को क्या करना चाहिए?

बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करें और उसका पालन करवाएं। मोबाइल उपयोग को लेकर बच्चों से खुलकर संवाद बनाए रखें। आउटडोर खेल, हॉबी और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। घर में बेडरूम और खाने की मेज को स्क्रीन-फ्री जोन बनाएं। पैरेंटल कंट्रोल के जरिए बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखें। व्यवहार, नींद या पढ़ाई में बदलाव दिखे तो तुरंत ध्यान दें। जरूरत पड़ने पर काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें। खुद भी डिजिटल अनुशासन अपनाकर बच्चों के लिए उदाहरण बनें। बच्चों को लंबे समय तक बिना निगरानी मोबाइल न दें। जिद या रोने पर फोन देकर चुप कराने की आदत न डालें। देर रात तक गेम खेलने या इंटरनेट इस्तेमाल की अनुमति न दें। बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को पूरी तरह नजरअंदाज न करें। अचानक मोबाइल छीनने या सख्त पाबंदी लगाने से बचें। चिड़चिड़ापन, गुस्सा या सामाजिक दूरी जैसे संकेतों को हल्के में न लें। पढ़ाई में ध्यान भटकने को सामान्य समझकर अनदेखा न करें।