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मणिपुर Live: जब मौत से हुई आंख-मिचौली, तब पत्रिका रिपोर्टर को बचाने के लिए निकली BSF

मैंने मक्सिमम रिस्क का एनालिसिस शुरू किया। मैं वो सबकुछ सोचने लगा, जिससे वहां से बचकर निकला जा सकता है। उनके तेवर ने मुझे हेडशॉट और सीने में गोरी मारे जाने के दृश्य को सोचने पर मजबूर किया।

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मेरे पास टिप थी कि वहां अफीम खेती, उग्रवादी ग्रुप्स के लिए अवैध हथियारों की सप्लाई पर बड़ी स्टोरी मिल सकती थी।

ये उन 6 घंटे का सिर्फ एक लम्हा था। जब मणिपुर कवरेज 8वें दिन आतंकियों ने बंधक बना लिया। आइए आपको 7 अगस्त के उस दिन में ले चलते हैं…

सुबह 11:30 बजे, रोज की तरह बुलेटप्रूफ PRESS जैकेट के साथ निकला
मणिपुर कवरेज का 8वां दिन। इंफाल स्थित मणिपुर राजभवन से 3 किलोमीटर और मुख्यमंत्री आवास से 4 किलोमीटर दूर मैं अपने होटल मणिपुर हाउस से स्कूटी से निकला। मैंने बुलेटप्रूफ प्रेस जैकेट भी पहनी थी। उसपर छाती पर सफेद रंग से बोल्ड अक्षरों में PRESS लिखा हुआ है।

सुबह 11:45 बजे, इंटरनेट से कनेक्ट हुआ, मणिपुर के बाहर की दुनिया देखी
पहला ठिकाना DIPR ऑफिस। पूरे इंफाल में मीडिया के लिए बस यही पर इंटरनेट मिलता है। करीब घंटेभर मैंने बीते दिन जुटाए हुए ऑडियो-वीडियो फुटेज शेयर किए। जरूरी मैसेज पत्रिका के जयपुर ऑफिस भेजा। अब झूठ क्या बोलना, यहीं से मम्मी-पापा के व्हाट्सएप मैसेज का जवाब भी दिया। दोस्तों के मैसेज भी देखे। पिछले दिन मेरी कवरेज का क्या-क्या पब्लिश हुआ उसे देखा। व्हाट्सएप और फेसबुक शेयर किया।

दोपहर 1:00 बजे, वार जोन फाएंग गांव के लिए निकले
बीते 7 दिनों से इंफाल घूमने, म्यांमार बॉर्डर की हकीकत पता करने के बाद अब बाकी रह गया था, फाएंग कूकी गांव। हां, वही जगह जिसे वार जोन कहते हैं। यहां कूकी और मैतेई दोनों के घरों को जला दिया गया था। उन स्कूलों को जला दिया गया है, जिसमें मैतेई और कूकी दोनों के बच्चे पढ़ते थे। स्टेट पुलिस और असम राइफ्लस यहां पहुंच नहीं पा रही। उन्हें बीच में रोक लिया गया है।

जरूरी था कि यहां की कहानी लोगों के सामने लाया जाए। आखिर उस गांव में क्या चल रहा है जहां रोज घर जलाए जा रहे हैं। पुलिस असहाय है। क्या है वहां की हकीकत।

मेरे पास टिप थी कि वहां अफीम खेती, उग्रवादी ग्रुप्स के लिए अवैध हथियारों की सप्लाई पर बड़ी स्टोरी मिल सकती थी। यह पता चल जाता कि असम राइफल्स, बीएसएफ और सीआरपीएफ क्यों वहां फायरिंग नहीं रोक पा रही। करीब 1 बजे मैं DIPR ऑफिस से करीब 25 किलोमीटर दूर फाएंग गांव के लिए निकल पड़ा।


दोपहर 1:15 बजे, इंडियन आर्मी गो बैक

अभी सिर्फ 500 मीटर ही आगे बढ़ा था। करीब 200 महिलाएं सड़क जाम करके बैठी हैं। माथे पर ट्रेडिशन पीला और सफेद रंग का टीका लगाए हुई हैं। उनमें से करीब 10 से 12 लोग सूट सलवार में हैं। उनका स्टाइल थर्ड जेंडर जैसा है। महिलाओं की इस ग्रुप को मीरा पाईबीज कहते हैं। ये मैतेई ग्रुप की महिला डिफेंस फोर्स हैं। इनमें प्रेगनेंट महिलाएं भी हैं। लेकिन तेजी से बढ़कर सभी गाड़ियों को चेक कर रही हैं।

भीड़ देखकर मैं रुका। वहां हंगामा हो रहा थ। महिलाओं ने करीब 6 ट्रकों को रोका हुआ है और लगातार चिल्ला रही हैं- इंडियन आर्मी गो बैक।

मैंने ट्रक के साथ आए अर्मी ड्रेस पहने एक जवान से पूछा क्या हुआ? उन्होंने बताया कि वो 9 गोरखा रेजिमेंट से हैं। वो हथियार और फौज लेकर फाएंग गांव की तरफ ही जा रहे थे। लेकिन महिलाओं ने उन्हें रोक लिया था। उन्होंने बताया कि वो सुबेदार थे। लेकिन ऑन कैमरा कुछ कहने को राजी नहीं हुए।

मैं दूर आ गया। करीब 20 मिनट तक देखता रहा। कुछ समय बाद महिलाओं की आवाज और ज्यादा ऊंची हो गई थी। उनके चेहरे और लाल हो गए थे और वो फौज की ट्रक की ओर बढ़ने लगीं। ट्रकें वापस मुड़ी और लौट गईं। मैंने पूरा वाक्या कैमरे में रिकॉर्ड किया। फिर DIPR ऑफिस जाकर पूरा वीडियो-फोटो जयपुर ऑफिस भेज दिया। साथियों को सूचित किया कि इसे जनता तक पहुंचा देनी चाहिए।


दोपहर 2:15 बजे, चेकिंग पॉइंट पर अचानक स्कूटी बंद हो गई
मैं फिर फाएंग की ओर निकला। सड़क किनारे टायर जल रहे हैं, यहां वहां सूखे पेड़ जल रहे हैं। जेसीबी से लाकर बड़े-बड़े पत्‍थर सड़क पर रखे गए हैं। सभी पेट्रोल पंप बंद थे। मैंने पहले ही टंकी फुल करा रखी है। सीट के नीचे बॉटल में भी पेट्रोल रखा था। करीब डेढ़-दो किलोमीटर गुजरने पर 25 से 30 साल के 7-8 लड़के काली ड्रेस में मास्क लगाए दिखते हैं। घूरते हैं।

आगे बढ़ते रहे। करीब 3 किलोमीटर का सूनसान रास्ता आया। विकराल शांति। अधजले घर, धूएं की गंध। तभी कांगचुप गांव के पास स्कूटी रोकी। कुछ महिलाएं और 5 से 7 लड़के वायरलेस वॉकी-टॉकी लिए हुए हैं।

चेकिंग के बाद निकला तो स्कूटी अचानक से बंद हो गई। स्टार्ट की, हुई भी, लेकिन एक्सेलेटर देने पर पिकअप नहीं ले रही। सामने खड़े लड़कों ने वॉकी-टॉकी कुछ कहना शुरू किया। ‌फिर मुझे हाथ दिया। करीब 5 लोग आए। वो नशे में थे। लेकिन उन्होंने स्कूटी को चेक किया, बोले कि इसमें मोबिल ऑइल की दिक्कत है।

दोपहर 2:30 बजे, ग्रामीणों ने कहा- चलिए आपकी स्कूटी ठीक करा देते हैं
उन्होंने भरोसा दिलाया कि पास में ही कोई मैकैनिक है। वो स्कूटी को ठीक कर देगा। लेकिन वॉकी-टॉकी वाला शख्स लगातार करीब 50 मीटर दूर खड़े होकर कुछ बात कर रहा था।

दोपहर 2:45 बजे, मुझे बंधक बना लिया गया
मैंने वॉकी-टॉकी वाले शख्स के करीब गया। वह स्‍थानीय भाषा में बात कर रहा था। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। तभी मुझे अंग्रेजी के 2 शब्द सुनाई दिए- All Alert.

मेरे कान खड़े हुए। लेकिन जो 5 लोग थे वो लगातार मदद की बात कर रहे थे। बार-बार स्कूटी के पार्ट्स खोलकर देख रहे हैं। करीब 5 से 7 मिनट बीते होंगे, उसके बाद…

करीब 12 लोग आए। मिलिट्री ड्रेस में। आर्मी शूज, किमोप्लाज पैंट, ओलिव ग्रीन टीशर्ट, बुलेटप्रूफ जैकेट और उसमें ग्रेनेड लटके थे, चाकू और पिस्टल खोंसे हुए थे, कंधे पर इंसास और एके 47 लटक रही थी।

आते ही चारों ओर से घेर लिया। इसके बाद सवाल जवाब होने लगे-

सवालः नाम

जवाबः मैं विकास

सवालः किस मीडिया से है?

जवाबः राजस्‍थान पत्रिका

सवालः किधर से आया?

जवाबः जयपुर से, कुछ देर बाद, दिल्ली से। जयपुर कहने पर वो आपस में कुछ बात करने लगे थे, मुझे लगा
शायद वो इस शहर को नहीं जानते।

सवालः तेरा किधर आता है?

जवाबः मोबाइल, न्यूजपेपर और टीवी भी है। मैंने अखबार में छपी अपनी खबरें मोबाइल में दिखाने लगा। इंटरनेट नहीं था तो वेबसाइट नहीं दिखा पाया।

सवालः बैग चेक करा

जवाबः जवाब देने की मोहलत नहीं दी। जबर्दस्ती बैग छीनने लगे।

उन्होंने कैमरा निकाल कर उसके अंदर की फूटेज दिखाने को कहा। लेकिन उसमें मेमोरी कॉर्ड नहीं था। फिर उन्होंने मोबाइल में रिकॉर्ड की गई फूटेज दिखाने को कहा। मैंने दिखा दिया। फिर उन्होंने आईडी कार्ड छीन लिए।


दोपहर 3:15 बजे: 30 हथियार बंद और आ गए, एकदम नशे में थे
हमारी बात थोड़ी नॉरमल हो पाती कि करीब 30 हथियारबंद और आ गए। उनकी आंखें चढ़ीं थीं। मुंह से शराब की बू आ रही थी। उनका लहजा आक्रामक था। आवाज ऊंची थी। उनकी भाषा मेरे समझ नहीं आ रही थी। लेकिन उनका लहजा खतरनाक था। उनके कान में ईयरपीस लगे थे। लगातार आपस में सूचनाएं दे रहे थे।

दोपहर 3:30 बजे: मुझे जबरन एक जर्जर घर में बिठा दिया

मैं उन्हें यह बार-बार बता रहा था कि मेरे पास कॉपी-कलम और माइक अलावा कुछ भी नहीं। लेकिन उनमें दो लोग आए। मेरा हाथ पकड़ा। जबरन मुझे पास एक स्टोररूम जैसे दिखने वाले कमरे में बिठा दिया।

कमरे में मकड़ी के जाले लगे थे। नीचे मिट्टी में और दरवाजों पर दीमक लगे थे। ऐसा नहीं लग रहा था उस कमरे में कोई अर्से से गया भी था। यहां पहली बार मुझे अंदर से खतरा महसूस हुआ। मैंने ऐसी कई कहानियां सुन पढ़ ली थीं, जिनमें लोगों को किसी ऐसे ही घरों में डालकर उग्रवादी आग लेते थे।

दोपहर 4:00 बजे: उनके तेवर मुझे हेडशॉट और सीने में गोली मारने डर लगा
मैंने मक्सिमम रिस्क का एनालिसिस शुरू किया। मैं वो सबकुछ सोचने लगा, जिससे वहां से बचकर निकला जा सकता है। उनके तेवर ने मुझे हेडशॉट और सीने में गोरी मारे जाने के दृश्य को सोचने पर मजबूर किया। मेरे दिमाग ने दो हिस्से में सोचना शुरू किया। पहला कि मैं उन्हें किसी भी सूरत में बातचीत में एंगेज रखना। मैं लगातार उन्हें विश्वास दिलाता कि मुझसे उन्हें कोई खतरा नहीं है। दूसरी तरफ मैं अपने निकलने के फॉर्मूलों पर लगातार सोचता।


दोपहर 4:15 बजे, मुझे अचानक पहला दिन याद आया, जब…
मुझे अपना डे-1 यानी पहला दिन याद आया। मैं इसी क्षेत्र की दूसरी ओर गया था। जो इस पहाड़ी के उस तरफ था। वहां मैंने कादंगबंद प्राइमरी स्कूल में बीएसएफ कैंप देखा था। वहां 16वीं बटालियन की दूसरी कंपनी से मिला भी था। उनके असिस्टेंट कमांडेंट राकेश कुमार रणवा से मिला भी था। वह राजस्‍थान के झुंझुनू के रहने वाले हैं। पत्रिका को बखूबी जानते थे। उन्होंने अपना मोबाइल नंबर भी दिया था।

दोपहर 4:30 बजे: मैंने बीएसएफ असिस्टेंट कमांडेंट राकेश कुमार रणवा को फोन किया
टेरेरिस्ट ग्रुप और ज्यादा आक्रामक हो रहा था। मेरे दूसरे पॉकेट में दूसरा फोन था। मैंने निकाला और तत्काल असिस्टेंट कमांडेंट राकेश कुमार रणवा को फोन किया। पहली ही कॉल में फोन उठ गया।

मैंः सर नमस्ते, मैं विकास, राजस्‍थान पत्रिका से।
राकेशः हां, विकास। कैसे हो।

मैंः सर मदद चाहिए।
राकेशः सब ठीक है?

मैंः नहीं सर।
राकेशः क्या हुआ?

मैंः मुझे एक टेरेरिस्ट ग्रुप ने बंधक बना लिया है। उनके हाथों में हथियार हैं। मुझे जबरन एक घर में बिठा रहे हैं।
राकेशः कहां पे?

मैंः कांगचुप गांव के पास।
राकेशः डॉन बास्को स्कूल से कितनी दूर?

मैंः उससे एक किलोमीटर आगे, पहाड़ी की तरफ।
राकेशः मेरी एक पार्टी इंफाल से आ रही है। मैं तुरंत मदद भेजता हूं। टेंशन मत लो।

मैंः एक बार मैं आपकी बात यहां के लोगों से करा दूं?
राकेशः हां।

मैंने ग्रुप में जो शख्स लीडर जैसा लग रहा था, जिसके हाथ में वॉकी-टॉकी लगातार चल रही थी। उसे फोन दिया। उन्होंने आपस में बात की। उसके बाद मुझे फोन वापस किया गया।

राकेशः विकास रुको, मैं मदद भेज रहा हूं तुरंत। कुछ नहीं होगा।

उनकी आखिरी लाइन, ‘कुछ नहीं होगा’ ने मुझे साहस दिया।

दोपहर 4:40 बजे: बात के बाद वो हथियार लेकर मेरी तरफ बढ़े...
बीएसएफ कमाडेंड की बात से उग्रवादी ग्रुप में मुश्किल से 2 मिनट की नर्मी आई। लेकिन पीछे से एक-दो चीखे और पूरा महौल ही बदल गया। वो हथियार लेकर मेरी तरफ बढ़ने लगे। दो लोग धक्का-मुक्की करने लगे। वो मुझे एक तरफ खड़े करने लगे और खुद दूसरी तरफ इकट्ठा होने लगे। तेज आवाज में लोकल भाषा में चीखने-चिल्लाने और नारा लगाने वाले अंदाज में एक सुर में बोलने लगे।

तभी मेरे फोन की घंटी बजी…

दोपहर 4:45 बजे: एक अनजान नंबर से कॉल आई, विकास मैं सब इंस्पेक्टर मोहित…

फोन बजा। स्क्रीन पर अनजान नंबर था। कॉल उठते ही आवाज आई- विकास, मैं सब इंस्पेक्टर मोहित। राकेश सर ने आपसे आपसे बात करने को बोला था। आप कहां हैं? मैंने दोबारा लोकेशन उन्हें कंफर्म की। उन्होंने कहा कि वह रास्ते में ही हैं। करीब 5 मिनट में पहुंच जाएंगे।


दोपहर 4:50 बजेः तब तक सीने पर एके 47 तन चुकी थी…

मोहित ने पांच मिनट कहा था। रास्ता खाली था दूर तक दिखाई दे रहा था। करीब 5 ही मिनट के बाद मुझे एक और कुछ गाड़ियां अपनी ओर आती दिखीं। मैंने खुद की पहचान कराने के लिए हाथ उठाया और उनकी ओर हाथ हलाने लगा।

मेरे हाथ का इशारा पता नहीं वो देख पाए कि नहीं। लेकिन उग्रवादी ग्रुप के एक करीब 22 से 25 लड़के ने ठान लिया कि अब वो मुझे नहीं छोड़ेगा। फर्राटा उसने कंधे से एके 47 उतारी भागते हुए मेरे ठीक सीने पर बंदूक तान दी।

मेरे मुंह से सिर्फ 2 सेटेंस निकले…

I am an innocent Bro. We all are Indians, And I am here for You.

उसकी आंखों में देखा तो वो आते वक्त जितने गुस्से में था, इस सेटेंस के बाद थोड़ा कंफ्यूज लग रहा था।

मैं दोहराता रहा... (मैं अंग्रेजी में ये सब बोल रहा था, उसको यहां हिन्दी में लिख रहा हूं…)

मैं आपके लिए और मणिपुर के लोगों के लिए यहां आया हूं। मणिपुर की सच्चाई दिखाने आया हूं। अगर आपने मुझे मार दिया तो इससे आपको कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन आपकी बदनामी होगी कि आप प्रेस रिपोर्टर को भी आप मार दे रहे हैं।

मेरा कोई एक शब्द, और ट्रिगर दब जाता। मेरे हर एक शब्द जरूरी थे। मेरी समझ में जो आता गया मैं कहता गया। उसकी लाल आंखें एकदम मेरी आंखों में देख रही थीं। लेकिन मैं आपनी बातों कहता रहा। चेहरे पर बहुत ज्यादा डर को नहीं आने दिया।

दोपहर 5:00 बजे,मोहित की कॉल आती रही, लेकिन सीने पर एके 47 तनी थी तो कॉल नहीं उठा पाया…
मैं उग्रवादी ग्रुप के सीने पर बंदूक ताने लड़के से अपनी बात कह रहा था। जेब में फोन बज रहा था। लेकिन उस वक्त फोन उठाने की न मौका था और सच कहूं तो न हिम्मत।

उसने कुछ देर में सोच समझ कर कहा।

कौन आ रहा है?

मैंने कहा- बीएसएफ

बगल में खड़ा एक दूसरा शख्स आया और उस लड़के को वहां से ढकेलते हुए आगे ले गया। धीरे-धीरे करके हथियार बंद लोग वहां से छिटकने लगे। वो लोग गांव की ओर जाने लगे। गांव के दूसरे लोग वहां जमा होने लगे। मेरे भीतर साहस आया और मैंने दोबारा हाथ उठाकर गाड़ियों की ओर हाथ हिलाया।

दोपहर 5:10 बजे: मैंने दोबारा पुलिस को हाथ उठाकर लहराया, फोन भी उठा लिया

जैसे हथियारबंद लोग वहां से जाने लगे मैंने फोन उठा लिया। सामने मोहित थे। उन्होंने मुझसे मेरी पहचान पूछी। मैं लोगों के बीच घिरा हुआ था। मैंने हाथ उठाकर उन्हें अपनी पहचान कराई।

मोहित तुरंत उतरक नीचे आए। उनके साथ एक मणिपुर पुलिस का जवान था। लेकिन गांव वाले उनसे बहस करने लगे। अपने अफसर बहस होती देख पीछे से 10-15 हथियारों से लैस जवान और दौड़ते हुए वहां आए।

दोपहर 5:15 बजे: जवानों ने तुरंत मेरे आसपास एक घेरा बना लिया, मौत ने फिर घेरा

मोहित और उनके जवानों तेजी दिखाई और वो पूरी तैयारी में थे। उन्होंने आते ही सबसे पहले मेरे चारों तरफ एक घेरा बना लिया। मैं थोड़ी राहत महसूस करता लेकिन तभी चारों से एक अजीब वाइब्रेशन वाली चम्मचों के टकराने की आवाज गूंज गई।

दरअसल, वहां गांव वाले एक दूसरे को इकट्ठा करने के लिए बिजली के पोल पर चम्मच से मारते हैं। ये आवाज सुनते ही आसपास गांव वाले उस जगह पर इकट्ठा होने लगे। भीड़ उग्र होती जा रही थी।

दोपहर 5:20 बजे, जवान तुरंत मुझे लेकर अपनी गाड़ी की ओर भागे, मुझे बस में बंद करके शीशे चढ़ा दिए

मोहित लगातार वहां के लोगों से ऊंची आवाज में बात कर रहे थे। उनके करीब 10 जवान मौके पर नजर बनाए हुए थे। पांच ने मुझे घेरकर दौड़ाते हुए तेजी से बस में बिठाया और सभी शीशे चढ़ा दिए।

भीड़ लगातार मोहित से उलझ रही थी। लेकिन मेरे गाड़ी में बैठते ही सभी सिक्योरिटी फोर्स वापस गाड़ी में आए और हम वहां से निकल गए।

दोपहर 5:30 बजे, बीएसएफ कैंप कादंगबंद स्कूल

मामूली बारिश हो रही थी। राकेश सामने ही बैठे थे। उन्होंने देखते ही मुस्कुराते हुए कहा- विकास जी आ गए। चलिए वैसे तो आप आते नहीं। खाना तो खाए नहीं होंगे। इनके लिए खाना मंगा दीजिए।

दोपहर 6:00 बजे, बीएसएफ कैंप में खाने के बाद स्कूटी की याद आई

कैंप में खाने के बाद राकेश ने पूछा- कैसे गए थे वहां? मैंने बताया, स्कूटी से। उन्होंने कहा- कहां है? मैं सिर्फ मुस्कुराकर रह गया।

मैंने मान लिया था कि स्कूटी अब नहीं आएगी। लेकिन तभी मोहित के साथ गए मणिपुर पुलिस के कॉन्सटेबल ने बताया कि उन्होंने स्कूटी की चाभी निकाल ली थी। उन्होंने गांव वालों से ये भी कहा था कि…

ये स्कूटी इंफाल की है। उस रिपोर्टर की नहीं है। बल्कि यह स्कूटी एक मैतेई समुदाय के रहने वाली की है। इसे जला देने से कुछ हासिल नहीं होगा।

इन बातों से मुझे भी एक टिप मिल गई। मैंने उस गांव के बगल वाले गांव के प्रधान एन बॉवी सिंह से एक रिपोर्ट के सिलसिले में बात की थी। मैंने तुरंत उन्हें फोन किया और अपनी स्कूटी को बचाने के लिए कहा। हालांकि तब वो गुवाहाटी में थे। लेकिन उन्होंने मदद की बात कही।


रात 8 बजे, मुझे बीएसएफ की ओर से आधिकारिक तौर पर रेस्क्यू करने मैसेज आया
मैं नॉरमल हो गया था। लेकिन मुझे बीएसएफ कैंप से मुझे न जाने के लिए कहा गया। मैं वहीं रुक गया। रात में मुझे मोबाइल पर एसएमएस आया।

लगभग 072130 बजे राजस्थान पत्रिका मीडिया हाउस के पत्रकार विकास सिंह ने राकेश कुमार रणवा, कंपनी कमांडर बी/16 को फोन किया और बताया कि जब वह इम्फाल वापस लौट रहे थे तो फयांग और लमसांग के बीच अज्ञात सशस्त्र बदमाशों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और धमकी दी। क्यूआरटी के साथ कंपनी कमांडर तुरंत घटना क्षेत्र में पहुंचे। B/16 ने उन्हे सुरक्षित बचाया और बीएसएफ कैंप कदांगबंद में रात्रि आश्रय दिया।


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