जनता को राहत पहुंचाने के लिए बुलाया गया संसद का मानसून सत्र उसी के लिए आफत बन गया है। लगातार चौथे दिन लोकसभा और राज्यसभा हंगामें की भेंट चढ़ गई। जहां विपक्ष बेवजह मनमानी कर रहा है.. वहीं, सरकार भी समाधान का रास्ता नहीं निकाल पा रही है। लिहाजा, जनता की गाढ़ी कमाई व्यर्थ बह रही है। गुरुवार को भी सुबह 11 बजे लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई.. मगर बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे पर दोनों ही सदनों में विपक्ष हंगामा करता रहा।
विपक्षी दलों की तरफ से हो रही नारेबाजी के बीच छह मिनट के भीतर लोकसभा की कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा। स्पीकर ओम बिरला ने विपक्षी दलों के बर्ताव की लगातार दूसरे दिन निंदा की। उन्होंने कहा कि आपको यहां जनता ने तख्तियां लेकर मेज को तोड़ने के लिए नहीं भेजा है। लगातार हंगामे के बाद स्पीकर ओम बिरला ने कार्यवाही दोपहर दो बजे तक स्थगित कर दी। वहीं, राज्यसभा में भी हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही बाधित हुई और प्रश्नकाल नहीं हो सका। वहीं, शून्यकाल में कार्यकाल पूरा करने वाले 6 सांसदों को विदाई दी गई। इसके बाद विपक्षी सदस्यों ने नियम 267 के तहत दिए गए अपने 30 नोटिस उपसभापति हरिवंश द्वारा अस्वीकार किए जाने के विरोध में हंगामा शुरू कर दिया, जिसके चलते 12 बज कर तीस मिनट पर सदन की कार्यवाही अपराह्न दो बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।
राज्यसभा में पीठासीन सभापति भुवनेश्वर कालिता ने दोपहर दो बजे कार्यवाही शुरू होने के बाद सदस्यों से सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने में सहयोग की अपील की। हालांकि, नारेबाजी और शोरगुल जारी रहा। 15 मिनट तक हंगामा और शोर जारी रहने के चलते पीठासीन सभापति कालिता ने सदन की कार्यवाही शुक्रवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी।
लोकसभा में दोपहर दो बजे कार्यवाही शुरू होने पर भी विपक्ष का हंगामा जारी रहा। स्पीकर ओम बिरला की गैर हाजिरी में पीठासीन सभापति कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी ने सदस्यों से शांति और सदन की व्यवस्था बनाए रखने की अपील की, लेकिन विपक्षी दलों के सांसदों पर कोई असर नहीं पड़ा। हंगामे और शोरगुल के बीच सदन की कार्यवाही बाधित हुई। उन्होंने व्यवधान नहीं थमता देख कार्यवाही को 25 जुलाई यानी शुक्रवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी।
कुल मिलाकर, संसद के मानसून सत्र में बिहार चुनाव का असर देखा जा रहा है। यही वजह है कि हंगामे में संसद का कीमती समय और जनता का पैसा बर्बाद किया जा रहा है। सभी दलों की रुचि एक दूसरे पर निशाना साधने और नए साथियों की तलाश में ज्यादा है। सत्ता पक्ष की भी बेताबी इसी को लेकर है कि मतदाताओं को लुभाने के कितने जतन करे। संसद का सुचारू संचालन कैसे हो इसके लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। सांसदों की भारतीय लोकतंत्र के प्रति यह जिम्मेदारी तो बनती ही है कि संसद ठीक तरीके से अपना काम करे। इसके लिए ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का फार्मूला ईजाद करना ही चाहिए। क्योंकि देश की तस्वीर बदलने के लिए संसद भी चलनी चाहिए।