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मेरे जन्म की खबर सुनकर बेहोश हो गए थे पिता… UFC में भारत की पहली महिला फाइटर पूजा तोमर का बड़ा खुलासा

Pooja Tomar UFC Fight: अल्टीमेट फाइट चैंपियनशिप (UFC) में भारत की पहली महिला फाइटर बनने वाली पूजा तोमर ने बड़ा खुलासा किया है। पूजा ने बताया कि मेरे जन्म की खबर सुनकर मेरे पिता बेहोश हो गए थे। दो बेटियों के बाद तीसरी भी बेटी पैदा होने पर मेरे पिता को सदमा लगा था।

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भारत

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lokesh verma

Mar 23, 2025

Pooja Tomar UFC Fight: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के छोटे से गांव बुढाना की बेटी पूजा तोमर ने अल्टीमेट फाइट चैंपियनशिप (UFC) में भारत की पहली महिला फाइटर बनकर इतिहास रच दिया है। हालांकि पूजा के लिए यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। आयरलैंड की शाउना बैनन से अपनी अहम फाइट से पहले पूजा ने खुलासा किया कि मेरे जन्म की खबर सुनकर मेरे पिता बेहोश हो गए थे। दो बेटियों के बाद तीसरी भी बेटी पैदा होने पर मेरे पिता को सदमा लगा था। वे मुझे नहीं चाहते थे, लेकिन मेरी मां ने मुझे बचा लिया। पूजा ने कहा, बचपन से ऐसे माहौल में पली-बढ़ी थी तो मैंने ठान लिया था कि लड़कियों के प्रति लोगों की सोच को बदलने के लिए मुझे कुछ बड़ा करना होगा।

लड़कियों को लेकर छोटी सोच

रिंग में द साइक्लोन के नाम से मशहूर पूजा ने कहा, मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से आती हूं, जहां हमेशा लड़कों को ही ज्यादा सपोर्ट किया जाता था। लड़कियों को लेकर वहां के लोगों की सोच बेहद छोटी थी। मैं थोड़े बगावती तेवर वाली थी तो मेरे दिमाग में हमेशा यही चलता था कि मुझे इसे बदलना है।

जैकी चेन की फिल्में देखकर करती थी स्टंट

पूजा ने कहा, मैं बचपन में टीवी पर जैकी चेन की फिल्में देखती थी और उनसे स्टंट सीखती थी और सोचती थी कि ये सीखकर मैं लड़कों को मारूंगी। मैं दिखाना चाहती थी कि लड़कियां भी किसी से कम नहीं है। मैं वुशू खेलती थी जो मार्शल आर्ट से काफी मिलता है। इसके बाद मैंने मिक्स्ड मार्शल आर्ट (MMA) को चुना और इसमें वुशू से काफी मदद मिली। मुझे यहां तक पहुंचाने में मेरी मां और बहनों का खासा योगदान रहा। गौरतलब है कि पूजा ने पिछले वर्ष जून में अपनी पहली यूएफसी बाउट जीती थी।

चाचा ने साई सेंटर में कराया दाखिला

पूजा के चाचा ने उनका दाखिला भोपाल के साई सेंटर में कराया था। सालों की ट्रेनिंग के बाद पूजा ने एमएमए को चुना। पूजा ने जब एमएमए की शुरुआत की थी तो उनके पास किसी तरह का कोई अनुबंध नहीं था। पैसे का सोर्स नहीं, लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। जो थोड़े-बहुत पैसे मिलते थे उसे वह अपनी ट्रेनिंग पर खर्च करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे पूजा को पहचान मिलती गई और प्रायोजक मिलने लगे। पूजा ने जब यूएफसी की पहली बाउट जीती तो उनके लिए एक सपने का पूरा होने जैसा था।