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महज 6 महीने रहा था भाजपा के एकमात्र दलित अध्यक्ष का कार्यकाल, स्टिंग ऑपरेशन के बाद मचा सियासी भूचाल, देना पड़ा था इस्तीफा

साल 2020 में बंगारू लक्ष्मण भाजपा के अध्यक्ष बने और मार्च 2001 में रिश्वत के आरोप में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। गारू लक्ष्मण का जन्म साल 1939 में तब के आंध्र प्रदेश में हुआ। बंगारू का ताल्लुक माडिगा जाति से था। वह भाजपा के एकमात्र दलित अध्यक्ष थे।

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साल 1998 में केंद्र में तीसरी बार अटल बिहारी वाजपेयी (atal bihari vajpayee) की सरकार बनी। सत्ता में आते ही अटल सरकार पर संगठन की तरफ से व्रजपात होने लगा। पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भाजपा (BJP) की मुश्किलें बढ़ाई। फिर संगठन महासचिव गोविंदाचार्य ने अटल सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इन झंझावातों से अटल सरकार संभली ही थी कि पार्टी के अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे ने पद छोड़ने की पेशकश कर दी।

कुशाभाऊ ने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ने की घोषणा की। इससे पार्टी के भीतर अध्यक्ष पद को लेकर टेंशन बढ़ गई। उन्होंने अगस्त 2000 में पद से इस्तीफा दे दिया। फिर भाजपा के नए अध्यक्ष के लिए खोज शुरू हुई। साल 2020 में बंगारू लक्ष्मण भाजपा के अध्यक्ष बने और मार्च 2001 में रिश्वत के आरोप में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अटल सरकार ने सुचिता का हवाला देते हुए पहले केंद्र सरकार में मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का इस्तीफा लिया और फिर बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने पद से इस्तीफा दिया।

1969 में ली जनसंघ की सदस्यता

बंगारू लक्ष्मण का जन्म साल 1939 में तब के आंध्र प्रदेश में हुआ। उनके पिता बी नरसिम्हा और माता बी शिवम्मा थीं। बंगारू ने हैदराबाद में BA और फिर वकालत की पढ़ाई पूरी की। बंगारू का ताल्लुक दलित माडिगा जाति से था। महज 12 साल की उम्र में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक से जुड़ गए। उन्होंने 1969 में जनसंघ की सदस्यता ली। यहीं से उनका सक्रिय राजनीति का सफर शुरू हुआ।

उन्हें साल 1975 में आपातकाल के दौरान जेल भी जाना पड़ा था। इमरजेंसी खत्म होने के बाद वह 1980-1985 तक आंध्र प्रदेश के विधान परिषद के सदस्य रहे। 1996 से 2002 तक गुजरात से भाजपा सांसद के रूप में राज्यसभा भेजे गए। इस दौरान वह अटल बिहारी वाजयपेयी की सरकार में पहले योजना और कार्यक्रम क्रियान्वयन राज्यमंत्री बने। इसके बाद उन्हें नवंबर 1999 से अगस्त 2000 तक रेल राज्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गई। लक्ष्मण 2000 से मार्च 2001 तक भाजपा के अध्यक्ष के पद पर रहे। वे भाजपा के एकमात्र दलित अध्यक्ष थे।

करियर पर लगा फुलस्टॉप

‘तहकला’ मैगजीन के एक स्टिंग ऑपरेशन में फर्जी रक्षा सौदे के लिए उन्हें एक लाख रुपए लेते हुए दिखाया गया था। इस कारण अटल सरकार को बड़े स्तर पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। रिपोर्ट के अनुसार, बंगारू लक्ष्मण ने 5 जनवरी 2001 को M/S वेस्टेंड इंटरनेशनल के चीफ लाइजनिंग ऑफिसर मैथ्यू सैमुअल से एक लाख रुपए की घूस ली, बाकि की राशि डॉलर में लेने की बात हुई। घूस लेने का मकसद था कि उन्हें अपने पद का इस्तेमाल करते हुए रक्षा मंत्रालय में काम करने वाले कर्मचारियों को प्रभावित तकरना होगा और सेना में सप्लाई को लेकर HHTI के पक्ष में फैसला करने के लिए कहना होगा। स्टिंग ऑपरेशन सामने आने के बाद बीजेपी ने उनसे पल्ला झाड़ लिया।

पूर्व राष्ट्रपति ने दी थी बंगारू के पक्ष में गवाही

भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 'सीबीआई बनाम बंगारू लक्ष्मण' मामले में पूर्व भाजपा अध्यक्ष के पक्ष में गवाही दी थी। कोविंद ने कहा था कि वे लक्ष्मण को 20 सालों से एक साधारण और ईमानदार व्यक्ति के रूप में जानते हैं। लक्ष्मण बाद में भाजपा के अध्यक्ष बने। कोर्ट को कोविंद ने बताया था कि वह लक्ष्मण से तहलका की खबर प्रसारित होने के बाद मिले थे। बंगारू लक्ष्मण ने उन्हें बताया कि किस तरह से उन्हें इस मामले में फंसाया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने कोर्ट से कहा कि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि लक्ष्मण ने रिश्वत ली है या नहीं। कोर्ट ने 27 अप्रैल 2012 को लक्ष्मण को इस मामले में दोषी पाया और 4 साल की सजा सुनाई, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हें जमानत मिल गई। 1 मार्च 2014 को बंगारू लक्ष्मण का निधन हो गया।