29 मार्च 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बड़ी धनराशि खर्च के बाद भी आरओ प्लांट बंद, ग्रामीणों को नहीं मिल रहा पानी

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ और मीठा पानी उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से लगाए गए आरओ प्लांट अब शोपीस बनकर रह गए हैं। लाखों रुपए खर्च कर स्थापित इन प्लांटों के बंद होने से ग्रामीणों को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है, जिससे उन्हें महंगे दामों पर पानी खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है।

2 min read
Google source verification

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ और मीठा पानी उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से लगाए गए आरओ प्लांट अब शोपीस बनकर रह गए हैं। लाखों रुपए खर्च कर स्थापित इन प्लांटों के बंद होने से ग्रामीणों को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है, जिससे उन्हें महंगे दामों पर पानी खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है। रामदेवरा क्षेत्र सहित आसपास के कई गांवों में स्थापित आरओ प्लांट वर्षों से बंद पड़े हैं। ग्राम पंचायत रामदेवरा के मावा गांव में करीब पांच साल पहले लगाया गया आरओ प्लांट वर्तमान में निष्क्रिय है। इसी तरह एका, छायण और सूजासर सहित अन्य गांवों में भी कई प्लांट शुरू ही नहीं हो पाए या कुछ समय बाद बंद हो गए। सरकार ने फ्लोराइड प्रभावित सरहदी क्षेत्रों के लोगों को राहत देने के लिए यह योजना शुरू की थी।

करीब एक दशक पहले बड़ी राशि खर्च कर ग्रामीण क्षेत्रों में आरओ प्लांट स्थापित किए गए थे, ताकि लोगों को सस्ता और शुद्ध पानी मिल सके। योजना के तहत 2 रुपए में 20 लीटर पानी उपलब्ध करवाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजना सफल नहीं हो सकी। ग्रामीणों का कहना है कि आरओ प्लांट बंद होने से उन्हें फिर से फ्लोराइड युक्त पानी पीना पड़ रहा है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ने का खतरा बना हुआ है। कई स्थानों पर प्लांटों के आसपास झाड़ियां उग आई हैं, जो उनकी उपेक्षा को दर्शाती हैं। जानकार बताते हैं कि आरओ प्लांट को नियमित रूप से संचालित रखने के लिए मशीनों की जांच, विद्युत आपूर्ति और जल स्रोत की निगरानी जरूरी होती है। साथ ही, संचालन के लिए कार्मिक की नियुक्ति भी आवश्यक है, लेकिन इन व्यवस्थाओं के अभाव में अधिकांश प्लांट बंद हो गए।

आरओ प्लांट स्थापित करने वाली निजी फर्मों की सात साल की टेंडर अवधि 2025 में समाप्त हो चुकी है। इसके बाद नए सिरे से टेंडर नहीं होने के कारण प्लांटों का संचालन ठप पड़ा है। टेंडर शर्तों के अनुसार फर्मों को सात साल तक देखरेख करनी थी, लेकिन अधिकांश स्थानों पर यह जिम्मेदारी प्रभावी रूप से नहीं निभाई गई। ग्रामीणों ने प्रशासन से बंद पड़े आरओ प्लांटों को शीघ्र चालू करवाने की मांग की है, ताकि उन्हें सस्ती दर पर स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सके।