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ज़रा याद करो कुर्बानी: स्वतंत्रता सेनानी हरिभाऊ उपाध्याय का गांधीवाद से क्या रिश्ता था?

Haribhau Upadhyaya:हरिभाऊ उपाध्याय का गांधीवाद केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था। हटूंडी के गांधी आश्रम, पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक सुधार के जरिये उन्होंने सत्य, स्वदेशी, खादी और जनसेवा के विचारों को आगे बढ़ाया।
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भारत

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MI Zahir

Aug 11, 2026

Freedom Fighter Haribhau Upadhyay News

स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी विचारक पं. हरिभाऊ उपाध्याय ने अपना पूरा जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित कर दिया। ( विजुअल: पत्रिका)

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी का प्रभाव केवल राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं था। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, खादी, सामाजिक समानता और जनसेवा जैसे विचारों ने देशभर में एक नई राजनीतिक और सामाजिक चेतना पैदा की। राजस्थान में इन गांधीवादी मूल्यों को अपने सार्वजनिक जीवन, पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक कार्यों से आगे बढ़ाने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में हरिभाऊ उपाध्याय का नाम लिया जाता है।

जब भारत में स्वतंत्रता की लहरें उठ रही थीं

हरिभाऊ उपाध्याय की कहानी उस युग की है जब भारत में स्वतंत्रता की लहरें उठ रही थीं, और गांधीजी के विचारों ने लोगों के जीवन को दिशा दी। एक ऐसे नेता, साहित्यकार और समाजसेवी की यह कहानी है, जिन्होंने सत्य, अहिंसा और स्वदेशी के सिद्धांतों को न केवल अपनाया, बल्कि अपने जीवन में जीकर दिखाया।

गांधीवाद को जीवन-पद्धति और समाज सुधार के माध्यम के रूप में भी अपनाया

हरिभाऊ उपाध्याय का जीवन इस बात का उदाहरण है कि गांधीवाद को केवल राजनीतिक विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति और समाज सुधार के माध्यम के रूप में भी अपनाया जा सकता है। अजमेर उनकी प्रमुख कर्मभूमि बनी और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता के बाद के प्रशासनिक जीवन तक सार्वजनिक सेवा को महत्व दिया। ऐतिहासिक स्रोत उन्हें राजस्थान के प्रमुख गांधीवादी नेताओं में गिनते हैं।

गांधीवाद से कैसे जुड़ा हरिभाऊ उपाध्याय का जीवन?

हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म 24 मार्च 1892 को मध्य प्रदेश के भौंरासा गांव में हुआ था। उनका सार्वजनिक जीवन साहित्य और पत्रकारिता से शुरू हुआ। शुरुआती दौर में उन्होंने ‘औदुंबर’ के माध्यम से साहित्यिक गतिविधियों में भाग लिया और बाद में हिंदी पत्रकारिता से जुड़े। वे महावीर प्रसाद द्विवेदी और गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे प्रभावशाली हिंदी साहित्यकारों और पत्रकारों के संपर्क में आए।

स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक जागरण को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया

गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक जागरण को अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बनाया। उनके लिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति का सवाल नहीं थी, बल्कि समाज में आत्मनिर्भरता, समानता और नैतिक मूल्यों को मजबूत करना भी इसका हिस्सा था।

हटूंडी का गांधी आश्रम बना गांधीवादी प्रयोग का केंद्र

हरिभाऊ उपाध्याय और गांधीवाद के संबंध को समझने के लिए अजमेर के निकट हटूंडी में 1927 में स्थापित गांधी आश्रम सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक है। इस आश्रम को उन्होंने गांधीवादी विचारों और रचनात्मक कार्यों के केंद्र के रूप में विकसित किया। गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों में खादी, ग्रामोद्योग, सामाजिक सुधार और जनजागरण को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। हरिभाऊ उपाध्याय ने भी इन्हीं मूल्यों को अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ाया। हटूंडी का आश्रम उनके लिए केवल एक संस्थान नहीं था, बल्कि गांधीवादी जीवन-दर्शन को व्यवहार में उतारने का माध्यम था।

सत्याग्रह और सामाजिक सुधार की राह

हरिभाऊ उपाध्याय का जुड़ाव गांधीवादी राजनीति के उस स्वरूप से था जिसमें आंदोलन के साथ सामाजिक सुधार को भी बराबर महत्व दिया जाता था। वे सत्याग्रह, खादी और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों से जुड़े रहे। अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता पैदा करना भी उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा था। इस दृष्टि से उनका गांधीवाद केवल ब्रिटिश शासन के विरोध तक सीमित नहीं था। वे समाज के भीतर मौजूद असमानताओं और रूढ़ियों को दूर करने को भी राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का हिस्सा मानते थे।

पत्रकारिता बनी जनजागरण का माध्यम

हरिभाऊ उपाध्याय ने पत्रकारिता को सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना फैलाने का प्रभावी माध्यम बनाया। वे ‘औदुंबर’, ‘सरस्वती’, ‘प्रताप’, ‘प्रभा’ और ‘हिंदी नवजीवन’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। उपलब्ध साहित्यिक स्रोतों में उनके इन पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े संपादकीय योगदान का उल्लेख मिलता है। उनकी पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार या साहित्य प्रकाशित करना नहीं था। लेखन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार और जनभागीदारी के विचारों को लोगों तक पहुंचाना उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

साहित्य में भी दिखाई दिया गांधीवादी प्रभाव

हरिभाऊ उपाध्याय साहित्यकार भी थे। उनकी रचनाओं में ‘स्वतंत्रता की ओर’, ‘बापू के आश्रम में’, ‘साधना के पथ पर’, ‘दूर्वादल’, ‘सर्वोदय की बुनियाद’, ‘युगधर्म’ और ‘हिंदी नव जीवन’ जैसी कृतियां उल्लेखनीय हैं। उनके लेखन में राष्ट्रसेवा, नैतिकता, आध्यात्मिक चिंतन और सामाजिक चेतना के विषय दिखाई देते हैं। ‘बापू के आश्रम में’ जैसी रचना उनके गांधीवादी अनुभवों और विचारों को समझने के लिए विशेष महत्व रखती है। साहित्य उनके लिए विचारों को जनता तक पहुंचाने का एक और माध्यम था।

स्वतंत्रता के बाद अजमेर के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री

आजादी के बाद भी हरिभाऊ उपाध्याय सार्वजनिक जीवन से अलग नहीं हुए। वे 24 मार्च 1952 को अजमेर राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 31 अक्टूबर 1956 तक यह जिम्मेदारी संभाली। इसलिए उन्हें स्वतंत्र भारत के अजमेर राज्य का प्रथम और अंतिम मुख्यमंत्री कहना अधिक तथ्यात्मक है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उस समय अजमेर अलग ‘सी’ श्रेणी का राज्य था। सन 1956 के राज्य पुनर्गठन के बाद अजमेर का राजस्थान में विलय हुआ। इसलिए हरिभाऊ उपाध्याय को ‘राजस्थान का मुख्यमंत्री’ कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।

राजस्थान सरकार में मंत्री के रूप में भूमिका

अजमेर के राजस्थान में विलय के बाद हरिभाऊ उपाध्याय राजस्थान की राजनीति और प्रशासन में सक्रिय रहे। सन 1957 से 1962 तक उन्होंने राजस्थान सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद 1962 से 1967 तक शिक्षा विभाग के साथ उद्योग, नागरिक आपूर्ति और देवस्थान विभागों की जिम्मेदारियां भी संभालीं। इस दौर में उनका सार्वजनिक जीवन गांधीवादी मूल्यों और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन का उदाहरण रहा। शिक्षा और सामाजिक विकास से जुड़े क्षेत्रों में उनकी भूमिका उनके व्यापक जनसेवा दृष्टिकोण से जुड़ी थी।

पद्म भूषण से सम्मानित हुए हरिभाऊ उपाध्याय

हरिभाऊ उपाध्याय के सार्वजनिक, राजनीतिक और साहित्यिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। उन्हें 1966 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

हरिभाऊ उपाध्याय के गांधीवाद की असली पहचान

हरिभाऊ उपाध्याय और गांधीवाद का रिश्ता किसी एक आंदोलन या संस्था तक सीमित नहीं था। उनके जीवन में गांधीवादी विचार कई स्तरों पर दिखाई देते हैं:—

सत्य और अहिंसा - स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीवादी संघर्ष-पद्धति से जुड़ाव।

स्वदेशी और खादी -आत्मनिर्भरता और रचनात्मक कार्यक्रमों का समर्थन।

सामाजिक सुधार -अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता के खिलाफ जनचेतना।

ग्रामोन्मुखी दृष्टि - हटूंडी गांधी आश्रम के माध्यम से रचनात्मक कार्य।

पत्रकारिता -राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना को जनता तक पहुंचाने का प्रयास।

साहित्य -गांधीवादी और सर्वोदय विचारों को सरल भाषा में सामने रखना।

जनसेवा -स्वतंत्रता के बाद भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहना।

इसीलिए हरिभाऊ उपाध्याय को केवल स्वतंत्रता सेनानी या राजनेता के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी चिंतक के रूप में भी महत्वपूर्ण थे।

हरिभाऊ उपाध्याय : निधन और विरासत

हरिभाऊ उपाध्याय का निधन 25 अगस्त 1972 को हुआ। उनका सार्वजनिक जीवन स्वतंत्रता आंदोलन, पत्रकारिता, साहित्य, सामाजिक सुधार और स्वतंत्र भारत के प्रशासन-इन सभी क्षेत्रों से जुड़ा रहा। राजस्थान के इतिहास में उनका महत्व इसलिए भी है कि उन्होंने गांधीवादी विचारों को केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रखा। हटूंडी के गांधी आश्रम से लेकर पत्रकारिता, साहित्य और सार्वजनिक जीवन तक उन्होंने सत्य, सामाजिक सुधार, जनसेवा और आत्मनिर्भरता की उस सोच को आगे बढ़ाया, जिसे गांधी राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार मानते थे। संक्षेप में कहा जाए तो हरिभाऊ उपाध्याय का गांधीवाद उनके लिए कोई अलग राजनीतिक अध्याय नहीं था, बल्कि उनके जीवन और सार्वजनिक कार्यों की मूल प्रेरणा था।