
हरतालिका तीज ( hartalika teej ) का व्रत इस बार कुछ जगहों पर 1 सितंबर तो कुछ जगहों पर 2 सितंबर को रखा जाएगा। यह व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी आयु की कामना के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनोनुकूल पति पाने के लिए रखती हैं। सौभाग्य का पर्व हरतालिका तीज विवाहित महिलाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण व्रत होता है। लेकिन यह व्रत करवाचौथ व्रत ( karva chauth ) से भी ज्यादा कठिन होता है। इस व्रत की पूजा बहुत ही व्यवस्थित तरीके से की जाती ह। तो आइए जानते हैं हरतालिका तीज पूजा विधि, व्रत कथा और मंत्र....
हरितालिका तीज की पूजा विधि ( Hartalika teej puja vidhi ) :
हरतालिका तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती को इन मंत्रों के जप से करें प्रसन्न ( Hartalika teej mantra ) :
भगवान शिव को प्रसन्न करने के मंत्र-
ॐ पशुपतये नम:।
मां पार्वती को प्रसन्न करने के मंत्र-
ॐ शांतिरूपिण्यै नम:।
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हरतालिका तीज व्रत कथा ( Hartalika teej vrat katha ) :
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव जी ने माता पार्वती जी को इस व्रत के बारे में विस्तार पूर्वक समझाया था। मां गौरा ने माता पार्वती के रूप में हिमालय के घर में जन्म लिया था। बचपन से ही माता पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में पाना चाहती थीं और उसके लिए उन्होंने कठोर तप किया। 12 सालों तक निराहार रह करके तप किया और एक दिन नारद जी ने उन्हें आकर कहा कि पार्वती के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। नारद मुनि की बात सुनकर महाराज हिमालय बहुत प्रसन्न हुए। उधर, भगवान विष्णु के सामने जाकर नारद मुनि बोले कि, महाराज हिमालय अपनी पुत्री पार्वती से आपका विवाह करवाना चाहते हैं। भगवान विष्णु ने भी इसकी अनुमति दे दी।
फिर माता पार्वती के पास जाकर नारद जी ने सूचना दी कि आपके पिता ने आपका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती बहुत निराश हुईं उन्होंने अपनी सखियों से अनुरोध कर उसे किसी एकांत गुप्त स्थान पर ले जाने को कहा। माता पार्वती की इच्छानुसार उनके पिता महाराज हिमालय की नजरों से बचाकर उनकी सखियां माता पार्वती को घने सुनसान जंगल में स्थित एक गुफा में छोड़ आईं, यहीं रहकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू किया जिसके लिए उन्होंने रेत के शिवलिंग की स्थापना की. संयोग से हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया का वह दिन था जब माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना की. इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए उन्होंने रात्रि में जागरण भी किया।
उनके कठोर तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए माता पार्वती जी को उनकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया। अगले दिन अपनी सखी के साथ माता पार्वती ने व्रत का पारण किया और समस्त पूजा सामग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया. उधर, माता पार्वती के पिता भगवान विष्णु को अपनी बेटी से विवाह करने का वचन दिए जाने के बाद पुत्री के घर छोड़ देने से व्याकुल थे। फिर वह पार्वती को ढूंढते हुए उस स्थान तक जा पंहुचे। इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें अपने घर छोड़ देने का कारण बताया और भगवान शिव से विवाह करने के अपने संकल्प और शिव द्वारा मिले वरदान के बारे में बताया. तब पिता महाराज हिमालय भगवान विष्णु से क्षमा मांगते हुए भगवान शिव से अपनी पुत्री के विवाह को राजी हुए।
Published on:
29 Aug 2019 03:39 pm
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