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भूमि के डिजिटल दस्तावेज में त्रुटियों की भरमार, अब सुधार कराने को किसान काट रहे चक्कर

प्रदेश में डीआइएलआरएमपी के तहत भूमि दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन किया गया है। इसमें किसी किसान का खसरा गलत तो किसी के नक्शे में गड़बड़ रहना सामने आई है। डिजिटाइजेशन की जल्दबाजी ने राहत की जगह पैदा कर दी परेशानी। प्रदेश में 92% भू नक्शों का डिजिटाइजेशन फिर भी किसान परेशान हो रहे है।

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दिनेश कुमार स्वामी @ नागौर. प्रदेश में राजस्व भूमि के 1 लाख 52 हजार 123 कैडस्ट्रल नक्शे (खसरा/तिप्पन) दर्ज हो चुके हैं। इनमें से 1 लाख 40 हजार 212 नक्शे डिजिटाइजफोर्मेट में बदले गए हैं। यानी करीब 92.2% भूमि दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन का कार्य पूरा हो गया है।

यह तस्वीर देखने में जितनी सपाट है, अंदर से उतनी ही उलझन भरी है। ‘डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम’(डीआइएलआरएमपी) के तहत हुए इस कार्य में रही खामियां किसानों पर भारी पड़ रही है। इससे राजस्व न्यायालयों पर प्रकरणों का बोझ बढ़ता जा रहा है। रिकॉर्ड डिजिटल करने के दौरान गलत नक्शों, जमाबंदी में इंतकाल में खामी आदि से उपखण्ड कार्यालयों में रोजाना किसान त्रुटि सुधार के दावे प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रदेश के कुल 48 हजार 740 गांवों में से 40 हजार 73 गांवों के स्पेशियल डेटा का सत्यापन किया जा चुका हैं। शतप्रतिशत दस्तावेज डिजिटल वाला नागौर जिला अब इसमें रही खामियों में भी सबसे आगे है। यहां पर भू अभिलेखों में पटवारियों और अन्य कार्मिकों की गफलत से किसान परेशान है।

भूमि के नक्शों, जमाबंदी और खसरा-खातौनी को ऑनलाइन अपडेट करने की जल्दबाजी से रिकॉर्ड त्रुटिपूर्ण हो गए हैं। नतीजन अब किसान अपनी ही जमीन के सही रिकॉर्ड के लिए उपखण्ड कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।

खसरा सीमाएं गलत अंकित

किसानों का कहना है कि जिन खातों और खसरों का वर्षों पहले बंटवारा हो चुका था, उन्हें अलग-अलग दर्ज करने के जगह एक साथ ऑनलाइन रिकॉर्ड में दर्ज कर दिया। कहीं खसरा सीमाएं गलत अंकित है, तो कहीं जमाबंदी और भू-नक्शे में अंतर है। रिकॉर्ड सुधार के लिए किसानों को पटवारी, गिरदावर, तहसील और राजस्व न्यायालयों में जाना पड़ रहा है।

सुधार की राह लम्बी व खर्चीली

सबसे बड़ी समस्या रिकॉर्ड सुधार की प्रक्रिया लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है। किसान उपखण्ड न्यायालयों में दावे प्रस्तुत करते है। इनकी सुनवाई में कई महीने बीत जाते है। बार-बार तारीख पर तारीख, वकील की फीस और गांव से शहर आने-जाने का खर्च। इसमें समय बर्बाद हो रहा है, साथ ही राजस्व न्यायालयों में प्रकरण बढ़ रहे है।

यहां रही चूक

राजस्व मामलों से जुड़े अधिवक्ता कैलाश गालवा बताते है कि डिजिटाइजेशन से पहले प्रत्येक रिकॉर्ड का भौतिक सत्यापन और बंटवारा रिकॉर्ड की गहन जांच करनी थी। जहां चूक रही और इसका असर अगले कई सालों तक किसानों को भुगतना पड़ेगा। राजस्व विभाग को विशेष अभियान चलाकर ऐसे मामलों का निस्तारण करना चाहिए।

डीआइएलआरएमपी की प्रगति

जिला नक्शा डिजिटलाइजेशन प्रतिशत कुल गांव डाटा वेरीफिकेशन

नागौर 3,447 3,447 100% 855 855

डीडवाना-कुचामन 3,231 3,231 100% 797 797

राजस्थान 1,52,123 1,40,212 92.17% 48,740 40,073

उद्देश्य अभी अधूरा

डीआइएलआरएमपी का उद्देश्य भूमि अभिलेखों, जमाबंदी, खसरा, नक्शों और रजिस्ट्री व्यवस्था को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकीकृत करना है। ताकि भूमि विवाद कम हों और किसानों को सही रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकें।

प्रकरण आते रहते हैं

‘डीआइएलआरएमपी के दौरान किसी खेत के नक्शे की तरमीम गलत हो गई, किसी खेत को कहीं दिखा दिया। ऐसे प्रकरणों की जैसे-जैसे किसानों को जानकारी मिल रही है, वैसे-वैसे वे सुधार के लिए आते हैं। इनके वाद राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 136 के तहत एसडीएम कोर्ट में पेश किए जा रहे हैं। नागौर और मूण्डवा तहसील से ऐसे कई केस मेरे पाए आते हैं।

- भागीरथ चौधरी, अधिवक्ता, नागौर