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9 सितंबर को भगवान विष्णु लेंगे करवट, इस दिन जरुर पढ़ें ये पौराणिक कथा

चतुर्मास में इस दिन का विशेष महत्व

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भोपाल

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Tanvi Sharma

Sep 08, 2019

parivartini ekadashi 2019

देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु शयन के लिए चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर देव उठते हैं। भगवान विष्णु के शयनकाल से उठने तक का समय चतुर्मास कहलाता है। इन चतुर्मास का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व होता है। इन चुतुर्मास में आने वाली एकादशी का भी बहुत अधिक महत्व होता है। उन्हीं में से एक भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की एकादशी का भी बहुत महत्व माना जाता है। जिसे परिवर्तिनी एकादशी ( parivartani ekadashi 2019 ) कहा जाता है। इस एकादशी को पार्श्व एकादशी भी कहते हैं। इस बार एकादशी 9 सितंबर 2019 को पड़ रही है।

मान्यताओं के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट लेते हैं। इसलिए इस एकादशी का देवशयनी और देवउठनी एकादशी के समान महत्व माना जाता है। इस दिन भगवान श्री विष्णु के वामन रुप की पूजा की जाती है। परिवर्तनी एकादशी को मनोकामना पूरी करने वाली एकादशी कहा जाता है। एकादशी के दिन विष्णु-लक्ष्मी की सच्चे मन से पूजा करने पर व्यक्ति समस्त पापों से मुक्ति पाता है और मोक्ष प्राप्त करता है। आइए जानते है पूजा विधि, व्रत कथा और शुभ मुहूर्त

पढ़ें ये भी- जानें कब है परिवर्तनी एकादशी, पढ़ें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

परिवर्तनी एकादशी मुहूर्त

एकादशी समाप्त – 10 सितंबर 2019 को दोपहर 12:31 बजे

ऐसे करें एकादशी के दिन पूजा

एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें। भगवान विष्णु को स्नान कराकर, फूल-पत्तों और खासकर कमल के फूल से मंदिर सजाएं। उसके बाद रोली का तिलक लगाकर अक्षत अर्पित करें और मीठाई का भोग लगायें। विष्णु और लक्ष्मीजी की आरती की जाती है। इस दिन रात्रि में भजन-कीर्तन करने का विशेष महत्व है।

परिवर्तनी एकादशी व्रत कथा ( parivartini ekadashi vrat katha )

त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों और याचनाओं से प्रतिदिन भगवान का पूजन किया करता था। नित्य विधि पूर्वक यज्ञ आयोजन करता और ब्राह्मणों को भोजन कराता था। वह जितना धार्मिक था उतना ही शूरवीर भी। एकबार उसने इंद्रलोक पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान विष्णु के पास गए।

देवगुरु बृहस्पति सहित इंद्रा देवता प्रभु के निकट जाकर हाथ जोड़कर वेद मंत्रों द्वारा भगवान की स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु ने उनकी विनय सुनी और संकट टालने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने वामन रूप धारण करके अपना पांचवां अवतार लिया और राजा बलि से सब कुछ दान स्वरूप ले लिया।

भगवान वामन का रूप धारण करके राजा बलि द्वारा आयोजित किए गए यज्ञ में पहुंचे और दान में तीन पग भूमि मांगी। इस पर राजा ने वामन का उपहास करते हुए कहा कि इतने छोटे से हो, तीन पग भूमि में क्या पाओगे।

लेकिन वामन अपनी बात से अडिग रहे। इस पर राजा ने तीन पग भूमि देना स्वीकार किया और दो पग में धरती और आकाश माप लिए। इस पर वामन ने तीसरे पग के लिए पूछा कि राजन अब तीसरा पग कहां रखू, इस पर राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। क्योंकि वह पहचान गए थे कि वामन कोई और नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं।