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राजस्थान के अनोखे हाट: कैसे एक गांव ने अपनी कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी

Craft Heritage: राजस्थान के कई गांवों ने अपनी पारंपरिक लोक कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाई है। मोलेला, बागड़ू, बारू और शिल्पग्राम जैसे केंद्र आज संस्कृति, रोजगार और पर्यटन के मजबूत आधार बन चुके हैं।
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भारत

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MI Zahir

Aug 25, 2026

Rajasthan Folk Art News.

मोलेला, बागड़ू, बारू और शिल्पग्राम जैसी पारंपरिक कलाएं आज राजस्थान की वैश्विक पहचान बन चुकी हैं। ( फोटो: AI )

राजस्थान की मिट्टी से उपजी कला की अनूठी कहानी उस गांव की है, जिसने अपनी लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। यह कहानी केवल कला की नहीं, बल्कि गांव की आत्मा, मेहनत और पहचान की भी है।

मोलेला: मिट्टी में रची-बसी पहचान

राजसमंद जिले की खमनोर तहसील में स्थित मोलेला गांव अपनी मृण-शिल्प (टेराकोटा) कला के लिए मशहूर है। इस कला को मोहनलाल कुम्हार ने निखारा और देश-विदेश में इसकी पहचान बनाई। उन्होंने नदी और खेतों की चिकनी मिट्टी से बिना किसी सांचे के हाथों से आकृतियां बनाईं, जो पर्यावरण के अनुकूल और जीवंत थीं। धीरे-धीरे यह कला गांव से बाहर फैली और विदेशों तक पहुंची। कला गुरु मोहनलाल को 2002 में ‘शिल्पगुरु’ और 2012 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके पुत्र राजेन्द्र कुमार को 2016 में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। आज इस कला से लगभग सौ परिवार जुड़े हुए हैं, और मोहनलाल के पौत्र भी इसे आगे बढ़ा रहे हैं।

राजस्थान के अनोखे हाट और वैश्विक पहचान

स्थान/हाटखास कलाअंतरराष्ट्रीय पहचान
मोलेला (राजसमंद)टेराकोटा मृण-शिल्पपद्मश्री मोहनलाल कुम्हार, विश्वभर में पहचान
बारू (चित्तौड़गढ़)भांड-कला (स्वांग)800 वर्ष पुरानी परंपरा, अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच
बागड़ू (जयपुर)हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग2024 में GI टैग, कई देशों में निर्यात
बहरावती (धौलपुर)गलीचा निर्माणकांता देवी ने वैश्विक पहचान दिलाई
जयपुरब्लू पॉटरीकृपाल शैली दुनिया भर में प्रसिद्ध
शिल्पग्राम (उदयपुर)ग्रामीण हस्तशिल्पविदेशी पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण
अलवर हाटहस्तशिल्प बाजारPPP मॉडल से आधुनिक बाजार
पुष्कर हाटलोक शिल्पकारीगरों को बेहतर मंच
जैसलमेर हाटपारंपरिक कलापर्यटन से वैश्विक पहुंच
नाथद्वारा हाटस्थानीय हस्तकलारोजगार और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव

बारू गांव: 800 वर्ष पुरानी भांड-कला का संघर्ष

चित्तौड़गढ़ जिले के बारू गांव में भांड-कला (स्वांग) की 800 वर्ष पुरानी परंपरा है, जिसे कभी राजाओं के दरबारों में सम्मान मिलता था। छगनलाल भांड इस कला के प्रमुख हस्ताक्षर हैं, जिनके पिता रामचंद्र भांड उदयपुर दरबार से जुड़े थे। इस कला को गांव से निकाल कर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया गया, लेकिन समय के साथ इसका दायरा सिमटता जा रहा है।

बागड़ू प्रिंट: ब्लॉक-प्रिंटिंग की अंतरराष्ट्रीय पहचान

जयपुर के पास बागड़ू कस्बे की पारंपरिक हैंड-ब्लॉक प्रिंटिंग कला, जिसे बागड़ू प्रिंट कहा जाता है, को 2024 में जीआई टैग मिला। यह कला यूके, अमेरिका, जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में निर्यात होती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।

कांता देवी: धौलपुर की गलीचा कला की मिसाल

धौलपुर के बहरावती गांव की कांता देवी ने गलीचा निर्माण में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है। यह कला पारंपरिक रूप से ईरान से आई थी, लेकिन कांता देवी ने इसे राजस्थान में जीवित रखा और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।

कृपाल सिंह शेखावत: ब्लू पॉटरी में अंतरराष्ट्रीय पहचान

ब्लू पॉटरी की कला में कृपाल सिंह शेखावत ने 1974 में पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त किया। उन्होंने नीले रंग के अलावा 25 अन्य रंगों का प्रयोग कर इस कला को नया आयाम दिया। उनकी शैली को ‘कृपाल शैली’ कहा जाता है, और यह कला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।

शिल्पग्राम, उदयपुर: ग्रामीण हाट से वैश्विक मंच तक

उदयपुर में शिल्पग्राम एक 70 एकड़ का ग्रामीण कला और शिल्प केंद्र है। यहां विभिन्न राज्यों की झोपड़ियां, कलाकारों की जीवंत कारीगरी और हस्तशिल्प का बाजार है। यह हाट-बाजार पारंपरिक ग्रामीण कला को आधुनिक दर्शकों तक पहुंचाता है और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है।

सरकार की पहल: हाटों को आधुनिक मंच में बदलना

राजस्थान सरकार ने हाल ही में चार प्रमुख राज्य स्तरीय हाटों (अलवर, पुष्कर, जैसलमेर, नाथद्वारा) को पीपीपी मॉडल पर संचालित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसका उद्देश्य कारीगरों, बुनकरों, महिला स्वयं सहायता समूहों और छोटे उद्यमियों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। इन हाटों में आवास की सुविधा, नियमित मेले, कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम होंगे।

कहानी का असर और सीख

इन गांवों और कारीगरों की कहानी हमें बताती है कि कैसे पारंपरिक कला, जब उसे सही मंच और समर्थन मिले, तो वह गांव की पहचान बन कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक सकती है। मोलेला की मिट्टी से बनी मूर्तियां, बारू की भांड-कला, बागड़ू की प्रिंटिंग, धौलपुर की गलीचा, उदयपुर का शिल्पग्राम,हर एक ने अपनी अलग राह बनाई है।

सरकार की योजनाएं जैसे पीपीपी आधारित हाट, इन कलाओं को संरक्षित करने और उन्हें नए बाजारों से जोड़ने में मदद कर रही हैं। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, पलायन को रोकने और गांवों में रोजगार बढ़ाने का एक ठोस मार्ग है।

अब आगे का कदम क्या होगा

बहरहाल,सरपंचों और पंचायतों को चाहिए कि वे स्थानीय कारीगरों की पहचान करें, उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ें और गांव में छोटे-छोटे हाट या प्रदर्शनियों का आयोजन करें। इससे गांव की कला को नई ऊर्जा मिलेगी और युवा भी इससे प्रेरित होंगे। राजस्थान की मिट्टी में रची-बसी ये कलाएं केवल कला नहीं, बल्कि गांव की आत्मा हैं। जब इन्हें मंच मिलता है, तो वे गांव को पहचान, रोजगार और गर्व प्रदान करती हैं।