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दुख से मुक्ति और ज्ञान प्राप्ति के लिए चेतना का विकास जरूरी

कहते हैं कि जिसने भी जीवन में समता का विकास कर लिया समझो उसने दुखों से मुक्ति का मार्ग भी खोज लिया है।
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Sunil Sharma

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Updated: 26 Nov 2017, 9:28 AM IST

meditation, yoga

meditation

- डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल

वर्तमान दौर में जहां चारों ओर निराशा और दुख का वातावरण नजर आ रहा है। हर कोई किसी ना किसी रूप में दुखी महसूस कर रहा है। सही मायने में देखा जाए तो यह सब व्यक्ति के मानसिक चिंतन का प्रतिफल है। आज व्यक्ति के दुख का कारण भिन्न-भिन्न होता जा रहा है। दूसरों से प्रतिस्पद्र्धा जहां एक ओर दुख का कारण बनी है, वहीं अपनी अंतरात्मा की आवाज को नहीं सुनना भी इसका बहुत बड़ा कारण है।

आज सुख के प्रति बढ़ती लालसा में थोड़े से दुख का आगमन व्यक्ति के लिए बड़ी चिंता का कारण बन जाता है। दुख मुक्ति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति में ज्ञान के प्रति चेतना का विकास हो। आध्यात्मिक दृष्टि से कठिन परिस्थितियों में ही व्यक्ति की पहचान होती है। जीवन में बढ़ते मानसिक द्वंद्व और आसक्ति से परेशानी बढ़ी है। जरूरी है समता का अभ्यास करें। सम-भाव, सद्-विचार एवं सद्-चिंतन ही दुख मुक्ति की वजह बन सकता है।

बुराई से सजगता जरूरी
व्यक्ति बिना किसी प्रयोजन दूसरों को कष्ट देने में सुख का अनुभव करता है। दूसरों की राह में कांटे बिछाकर कोई कैसे सुख की कामना कर सकता है? जरूरी है कि व्यक्ति जीवन की बुराइयों के प्रति सजग रहे। वह विभिन्न प्रकार के भोगों में जकडक़र वासना का गुलाम बन जाता है यही दुख का कारण है। बुराइयों के प्रति सजग रहकर ही मन में सकारात्मक एवं स्वस्थ चिंतन को पैदा किया जा सकता है। जीवन में मानसिक पवित्रता का विकास एवं संयम की चेतना के विकास के साथ अनेक प्रकार की बुराइयों से बचा सकता है। इंसान बुरा नहीं होता, बुरी होती है वे भावनाएं जो दुर्गुण के रूप में मन को अपवित्र करती हैं।

मन का संतुलन है जरूरी
आध्यात्मिक जीवन विकास के लिए व्यक्ति को अनेक उपायों के माध्यम से मन को संतुलित करना होता है। मन का संतुलन ही समता की साधना का वाहक है। जिसने समता का विकास किया है उसने जीवन में दुखों से मुक्ति का मार्ग खोजा है। मनुष्य सदैव अपने दुर्बल मानसिक चिंतन से वर्तमान को कोसता है, लेकिन यह सच्चाई नहीं है बल्कि बुराई सदियों से रही है।

जरूरत है कि हम बुराई का परिष्कार सजगता के साथ करें तभी जीवन में समता के भाव का उद्भव हो सकता है। जिस जीवन में समता हो, वो जीवन सहज, सरल, शांत व दुर्गुणों से मुक्त बन जाता है। ज्यों-ज्यों जीवन में समता की साधना जागृत होती जाएगी, दुख मुक्ति जीवन में हिलोरे लेने लगेंगी।

सुख की आकांक्षा नहीं हो
दुनिया में धन, वैभव और भोग के प्रति आसक्ति व जीवन में सुख की आंकाक्षा ने अवगुणों को बढ़ाया है। अवगुणों के कारण ही मानव मन अशांत व चिंतित हुआ है, जिसके कारण व्यक्ति का चिंतन कष्ट व आपदाओं के प्रति चिंतन करते रहना है। यही चिंतन उदित होकर मानसिक दुख का कारण बन जाता है। व्यक्ति का चिंतन सकारात्मक होने के साथ सुख की आकांक्षा का त्याग कर पुरुषार्थ पर अधिक चिंतन रहे तो कष्ट होना असंभव ही होगा। व्यक्ति समता के साथ गुणों को जीवन में धारण करे तो आने वाले बुरे दिनों से निजात पा सकता है।

चारित्रिक विकास करें
व्यक्ति जीवन में खुशियां बांटने का उपक्रम शुरू कर दे तो अनेक समस्याओं से मुक्ति पा सकता है। व्यक्ति में चारित्रिक पतन चरम पर पहुंचा है। यही परेशानी का मूल कारण है। व्यक्ति को पद, प्रतिष्ठा, यश और नाम की अति-महत्वाकांक्षा ने मानसिक रूप से दुखी बनाया है। दूसरों की खुशी देखकर ईष्र्या के भाव ने भी मानव मन में परेशानी पैदा की है। जब वह स्वयं परेशान होता है तो किसी को सुख नहीं दे सकता। इस समस्या का एकमात्र समाधान चारित्रिक विकास के प्रति समर्पित होकर दूसरों को सुख का अनुभव कराना ही है।

श्रम व मौन का महत्व
जीवन में समता का अभ्यास बहुत जरूरी है, इसके अभाव में अपने स्वभाव को भूलकर विभाव में जाना है। श्रम का मानव जीवन पर विशिष्ट प्रभाव पड़ता है, श्रमशील व्यक्ति अपने पसीने से जीवन में स्वस्थ चिंतन की पौध को सुरभित कर सकता है। वहीं मौन जीवन की अनमोल साधना है। आज अधिकांश रूप से व्यक्ति अति भाषण से जीवन में अनेक समस्याओं को आमन्त्रित कर लेता है वहीं असम्यक वाणी से जीवन में अनेक द्वन्द्वों को जन्म दे देता है।