
सांकेतिक इमेज (सोर्स- ChatGpt)
सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। एक दशक से भी कम समय में भारत ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है। भारत की यह कामयाबी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में देश की बदलती हैसियत का प्रमाण भी है। संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की सौर क्षमता बढ़कर 162.15 गीगावाट हो गई है, जो 57 गुने की बढ़ोतरी दर्शाती है। यह आंकड़ा 22 जुलाई 2026 को संसद में दिए गए एक जवाब में सामने आया, जिसमें 30 जून 2026 तक के आंकड़े शामिल हैं। यह आंकड़े दिखाते हैं कि भारत की वृद्धि की रफ्तार 2030 के लक्ष्य से भी कहीं आगे चल रही है।
भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन से कुल 500 गीगावाट बिजली क्षमता का लक्ष्य रखा है। देश में साल 2013-2014 से हर साल सौर क्षमता का विस्तार किया है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस विस्तार के पीछे सोलर मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना और पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना जैसी रूफटॉप सब्सिडी योजनाएं प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में अकेले 44.61 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ी गई, जो पिछले रिकॉर्ड से दोगुने से भी ज्यादा है। जिसमें एक महीने में सबसे ज्यादा 6.6 गीगावाट क्षमता जोड़ने का रिकॉर्ड भी शामिल है।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने राज्यसभा में बताया कि कांग्रेस शासन के दौरान देश की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता केवल 81 गीगावाट थी, जबकि सौर ऊर्जा क्षमता महज 2.8 गीगावाट से बढ़कर अब 136 गीगावाट हो चुकी है। भारत आज के समय में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक बन गया है। अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) के आंकड़ों के हवाले से स्पष्ट है कि चीन और अमेरिका के बाद कुल नवीकरणीय क्षमता में भारत तीसरे स्थान पर है। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि यही क्रम सौर क्षमता में भी लागू होता है, क्योंकि यही दोनों देश दोनों श्रेणियों में आगे हैं। एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत संचयी स्थापित क्षमता में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे स्थान पर है। लेकिन 2025 में एक साल में जोड़ी गई नई क्षमता के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ चुका है।
भारत सिर्फ सौर ऊर्जा उत्पादन में ही नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में भी आगे बढ़ रहा है। यह केवल चीन की तरह कुछ बड़े रेगिस्तानी सोलर पार्कों की कहानी नहीं, बल्कि यूटिलिटी प्लांट, वाणिज्यिक-आवासीय छतों और खेतों में लगे सोलर पंपों तक एक साथ फैलते आधार की कहानी है, जो किसी एक क्षेत्र में व्यवधान की स्थिति में भी विकास को अधिक लचीला बनाती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2026 तक भारत की मॉड्यूल निर्माण क्षमता सालाना 200 गीगावाट को पार कर चुकी है।
भारत की तेज रफ्तार के रफ्तार के बावजूद चीन पर निर्भरता एक चुनौती बनी हुई है। अमेरिका के ORF (Observer Research Foundation) की रिपोर्ट के मुताबिक, जो देश सौर पीवी मॉड्यूल तैनात करते हैं। वे कोयले या प्राकृतिक गैस जैसे अन्य ऊर्जा स्रोतों के आयात को विस्थापित करके अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करते हैं। इसीलिए भारत सहित कई देश सौर पीवी मॉड्यूल की व्यापक तैनाती को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि आपूर्ति शृंखला की गहराई में जाएं तो तस्वीर जटिल है। पीवी मैगजीन की रिपोर्ट बताती है कि जून 2026 तक के उद्योग अनुमानों के अनुसार, चीन सौर वैल्यू चेन में वैश्विक विनिर्माण क्षमता के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर काबिज है। इसके साथ ही चीन वैश्विक वेफर उत्पादन के 95 प्रतिशत से ज्यादा को नियंत्रित करता है।
पॉलीसिलिकॉन उत्पादन में भी चीनी निर्माताओं का ही दबदबा कायम है। इनवर्टर के मोर्चे पर भी चुनौती बरकरार है। एक रिसर्च के हवाले से बताया गया कि वैश्विक स्तर पर इनवर्टर की मैन्युफैक्चरिंग में भी चीन का दबदबा है। जिसमें सनग्रो, सिनेंग इलेक्ट्रिक और होपविंड ने मिलकर कुल शिपमेंट का करीब 85.5 प्रतिशत हिस्सा शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षा निगरानी मजबूत करने वाला अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी।
Updated on:
10 Aug 2026 05:25 pm
Published on:
10 Aug 2026 05:25 pm
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