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जाटों की सेना ने तैमूर लंग को खदेड़ा था, मेरठ और हरिद्वार में हुआ था भीषण युद्ध

तैमूर एक आततायी आक्रमणकारी था, फिर से सुर्खियों में आया जानिए क्यों

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Rajkumar Pal

Dec 24, 2016

taimurlang

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संजय श्रीवास्तव, नोएडा। बॉलीवुड अभिनेत्री करीना और अभिनेता सैफ अली खान ने अपने नवजात बेटे का नाम तैमूर क्या रखा, देशभर में तैमूर लंग के क्रूर कारनामों की चर्चा होने लगी। चूंकि वह आततायी आक्रमणकारी था। उसने भारत में जबरदस्त कत्लेआम किया था, लिहाजा लोगों को इस नाम पर एतराज भी खूब हुआ। क्या आपको मालूम है कि उसे जाटों की शक्तिशाली सेना ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में न केवल घेरा बल्कि हरिद्वार के करीब घमासान युद्ध के बाद खदेड़ भी दिया।


मेरठ में घेरा फिर मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में

कई लेखकों ने जाटों पर जो इतिहास लिखा है, उसके अनुसार पंजाब और दिल्ली में तैमूर ने बेशक खून की नदियां बहा दी थीं लेकिन मेरठ पहुंचने के बाद उसे पसीने आने लगे। पहले जाट सर्वखाप महापंचायत की ताकतवर जाटों की सेना ने उसे मेरठ में घेरा। वहां भीषण युद्ध हुआ। फिर मुजफ्फरनगर में यही सिलसिला चला। जब तैमूर लंग की 90 हजार घुड़सवारों की सेना ने हरिद्वार की ओर बढ़ने की कोशिश की तो सहारनपुर के पास ज्वालापुर में उसे जाटों ने ऐसा घेरा कि उसे आगे बढ़ने का इरादा ही नहीं छोड़ना पड़ा बल्कि समझ में आ गया कि वापस लौट जाने में ही भलाई है।


शक्तिशाली जाट महापंचायत की सेना

वर्ष 1398 में तैमूर लंग ताकतवर फौज के साथ पंजाब में घुसा, वहां तबाही फैलाते हुए उसने दिल्ली में भी खून की नदियां बहाईं। जब उसने दिल्ली से सटे लोनी में भी करीब एक लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया तो जाटों को लग गया कि तैमूर के निशाने पर अब कौन सा इलाका होगा। गंगा-यमुना के बीच बसे पश्चिम उत्तर प्रदेश के इस इलाके पर तैमूर की नजर इसलिए भी थी क्योंकि ये काफी समृद्ध इलाका था। जाट समझ गए कि तैमूर क्या करने वाला है। तुरत-फुरत सर्वखाप की महापंंचायत बुलाई गई। इसमें सेना के प्रधान सेनापति और अन्य सेनापति तय किए गए। खास बात ये थी कि इस सेना में जाट, गुर्जर, दलित सभी जातियों का प्रतिनिधित्व था। इस सेना के प्रधान सेनापति बनाए गए गुर्जर महाबली दादावीर जोगराज पंवार।


40 हजार महिलाएं भी थीं सेना में

जाटों की इस सेना में 40 हजार महिलाएं भी थी। ये वीरांगनाएं शस्त्रों से लैस थीं। उन्होंने बहुत बहादुरी से युद्ध में हिस्सा लिया। उनकी जिम्मेदारी भी दोहरी थी। वह पुरुष सेना को भोजन भी उपलब्ध कराती थीं। साथ ही युद्ध के मैदान में डटकर शत्रु का मुकाबला भी करती थीं। जाटों की ये सेना दिन में तो युद्ध करती ही थी, रात में भी तैमूर की सेना को चैन नहीं लेने देती थी।

हरिद्वार के उस युद्ध के बाद तैमूर को भागना पड़ा

हरिद्वार के करीब पथरीगढ़ (ज्वालापुर)में युद्ध के दौरान जाटों की सेनाओं ने तैमूर की सेना के दांत पूरी तरह खट्टे कर दिए। उन्हें समझ में आ गया कि इस फौज से पार पाना शायद उनके लिए संभव नही होगा। लड़ाई के दौरान ही जाट सेना के एक सेनापति हरबीर सिंह गुलिया ने अपना भाला तानकर तैमूर के सीने पर ऐसा मारा कि वह घोड़े से नीचेे गिर पड़ा। उसे इतना भयंकर घाव हुआ कि वापस लौटना पड़ा। कुछ लोग कहते हैं कि समरकंद के रास्ते में ही उसकी मौत हो गई जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वह समरकंद पहुंंचकर मर गया।

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