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Noida Protest: ‘मात्र 39 रुपए बढ़ा वेतन’, कर्मचारियों ने कहा- 13 हजार की सैलरी से घर कैसे चलाएं, कमरतोड़ गई महंगाई

Night Shift Harassment: दिल्ली से सटे नोएडा के फेस-2 इलाके में पिछले चार दिनों से सुलग रहा मजदूरों का गुस्सा सोमवार सुबह ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा, जानें क्यों मचा बवाल?

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नोएडा

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Pooja Gite

Apr 13, 2026

noida phase 2 garment workers protest salary hike inflation violence

photo ANI

Noida Protest: दिल्ली से सटे नोएडा के फेस-2 इलाके में पिछले चार दिनों से सुलग रहा मजदूरों का गुस्सा सोमवार सुबह ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। वेतन वृद्धि और बढ़ती महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे गारमेंट श्रमिकों का सब्र तब टूट गया जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन पत्थरबाजी और आगजनी में तब्दील हो गया। हाथों में पत्थर और आंखों में बेबसी लिए इन मजदूरों का बस एक ही सवाल है '13 हजार की सैलरी में इस कमरतोड़ महंगाई के बीच घर कैसे चलाएं?'

यह विरोध प्रदर्शन शुक्रवार से ही सुलग रहा था, जिसमें गारमेंट और एक्सपोर्ट इंडस्ट्री से जुड़े सैकड़ों मजदूरों ने साथ मिलकर आवाज उठाई। इन्हीं प्रदर्शनकारियों में शामिल संभल यूपी के रहने वाले 18 वर्षीय सुरेंद्र कश्यप, जो सेक्टर-49 स्थित 'अनुभव अपेरल्स' में मेजरमेंट चेकर के तौर पर काम करते हैं, ने मजदूरों की बदहाली की एक दर्दनाक तस्वीर पेश की। सुरेंद्र का सीधा सवाल है कि यदि मानेसर में 8 घंटे की ड्यूटी का वेतन 20,000 रुपए हो सकता है, तो नोएडा के मजदूरों के साथ यह भेदभाव क्यों? अपनी आपबीती सुनाते हुए उन्होंने कहा कि 13,000 रुपए की मामूली तनख्वाह में से 4,000 रुपए कमरे के किराए में चले जाते हैं और ऊपर से गैस सिलेंडर जैसी बुनियादी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, ऐसे में गुजारा करना नामुमकिन हो गया है।

'छुट्टी मांगने पर नौकरी से निकालने की धमकी'

वेतन की कमी के साथ-साथ सुरेंद्र ने कार्यस्थल पर होने वाले शोषण का भी जिक्र के बारे में भी बताया कि कंपनी एक घंटे में 70 पीस तैयार करने का अव्यावहारिक टारगेट देती है और इसे पूरा न करने पर मजदूरों को बूरा भला सुनाया जाता है। सालों की मेहनत के बाद भी सैलरी में महज 320 रुपए की बढ़ोतरी की गई है, जबकि जबरन नाइट शिफ्ट कराना और रविवार को छुट्टी मांगने पर नौकरी से निकालने की धमकी देना अब कंपनियों की आम कार्यशैली बन चुकी है।

'39 रुपए की वेतन वृद्धि और 4 लोगों का परिवार'

कन्नौज उत्तर प्रदेश के रहने वाले 25 वर्षीय राहुल साल 2018 से एक्सपोर्ट लाइन में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन उनकी माली हालत आज भी जस की तस बनी हुई है। राहुल ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि 13,500 रुपए की सैलरी में बचत तो दूर वह अपने गांव पैसे भेजने की स्थिति में भी नहीं हैं। 5,000 रुपये कमरे का किराया और 4,000 रुपए राशन में खर्च करने के बाद पीएफ की कटौती के चलते उनके पास महीने के अंत में मात्र 3,000 रुपये बचते हैं। दो छोटे बच्चों 3 साल और 1 साल के पिता राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती चार लोगों के परिवार का पेट पालने और बच्चों की शिक्षा की है। उन्होंने व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए बताया कि पिछले पूरे साल की मेहनत के बदले कंपनी ने उनके वेतन में मात्र 39 रुपए की बढ़ोतरी की, जो मौजूदा महंगाई के दौर में एक क्रूर मजाक जैसा है।

'महंगाई ने छीनी मां के हिस्से की मदद'

सीतामढ़ी बिहार के निवासी 28 वर्षीय मोहम्मद नूर आलम, जो यहां कारीगरी का काम करते हैं, हालांकि अन्य मजदूरों की तुलना में 20,000 रुपए कमाते हैं, लेकिन बढ़ती महंगाई ने उन्हें भी घुटनों पर ला दिया है। नूर आलम का दर्द यह है कि इतनी कमाई के बाद भी वह अपनी बूढ़ी मां को एक रुपया तक नहीं भेज पा रहे हैं, क्योंकि सारा पैसा रोजमर्रा के खर्चों की भेंट चढ़ जाता है। उन्होंने बीते दिनों को याद करते हुए कहा कि कभी चावल 15 रुपए किलो मिलता था, लेकिन अब कीमतें बेकाबू हैं। उन्होंने सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि हमने बदलाव की उम्मीद में वोट दिया था, लेकिन आज आलम यह है कि सिलेंडर के लिए कालाबाजारी में 5,000 रुपये तक मांगे जा रहे हैं। उनका सवाल वाजिब है कि यदि अंतरराष्ट्रीय युद्ध के कारण ईंधन महंगा है, तो बाकी घरेलू चीजों के दाम क्यों बढ़ रहे हैं? आज स्थिति यह है कि पैसे देने के बावजूद उन्हें रसोई गैस तक मयस्सर नहीं हो पा रही है।