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अगर आप भी ऑनलाइन ग्रॉसरी का सामान खरीदते हैं तो हो जाएं सावधान, बड़ा खेल आया सामने

Highlights: -राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है, क्योंकि इस कॉलिंग का डाटा भारत सरकार के पास नहीं होता है -आरोपी विदेशों की कॉल्स के लिए चार्ज का महज 10 से 15 फीसदी ही लेते थे -सरकार को प्रतिमाह 20 से 25 लाख रुपये का हो रहा था घाटा

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क

नोएडा। कोतवाली फेज-3 स्थित सेक्टर-63 में चल रहे एक फर्जी अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन एक्सचेंज का पर्दाफाश कर पुलिस ने उसके संचालकों को गिरफ्तार किया है। आरोपी निजी सर्वर से दूरसंचार विभाग (डीओटी) के भारतीय सर्वर को बाईपास कर भारत में अंतरराष्ट्रीय कॉल करवा रहे थे। इससे सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा था। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है, क्योंकि इस कॉलिंग का डाटा भारत सरकार के पास नहीं होता है। पुलिस ने लैपटॉप, एसआईपी सर्वर, अन्य सर्वर, सीपीयू, एसआईपी ट्रंक डिवाइस, वीओआईपी डायलर सहित अन्य उपकरण बरामद किए हैं।

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दरअसल, सेक्टर-63 एच ब्लॉक स्थित बीएसआई पार्क के फर्स्ट फ्लोर में बेस्ट स्टार बी के इंटर प्राइस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी पर दूरसंचार विभाग, एटीएस और नोएडा पुलिस टीम ने छापा मारा और फर्जी अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन एक्सचेंज का पर्दाफाश कर संचालक और कंपनी की निदेशक के पति कर्म इलाही को गिरफ्तार किया। हिरासत में लिए गए जम्मू कश्मीर के बारामुला स्थित पांजला तालीमनगर निवासी करम इलाही, सोपोर के भटपुरा निवासी बासित फारुक डार और करम इलाही की पत्नी आसिया अफजल संचालित कर रहे थे। पुलिस व अन्य सुरक्षा एजेंसी से बचने के लिए आरोपी कंपनी में रखे कर्मचारियों के द्वारा फर्जी कॉल सेंटर बनाकर ऑनलाइन लोगों को ग्रॉसरी का सामान बेचने विज्ञापन करते थे। इसके तहत गिफ्ट देने का भी दावा करते थे। दावा किया जा रहा था कि फरवरी के अंदर में सेल शुरू होगी, जबकि तीनों मुख्य आरोपी कॉल सेंटर की आड़ में फर्जीवाड़ा कर रहे थे।

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कॉल सेंटर आरोपियों ने अपना ऑफिस खोलने के लिए बिल्डिंग मालिक से 30 दिसंबर 2020 को एग्रीमेंट किया था। इसके बाद चार जनवरी को ऑफिस शुरू किया। पुलिस आरोपी के भारतीय नंबरों पर ट्रांसफर की गई कॉल का रिकॉर्ड खंगालेगी ताकि पता चल सके कि किस देश से किसके पास कॉल की गई। ताकि पता चल सके कि उनके तार राष्ट्र विरोधी लोगों से तो नहीं जुड़े हैं। आरोपी विदेशों की कॉल्स के लिए चार्ज का महज 10 से 15 फीसदी ही लेते थे। ऐसे में सरकार को प्रतिमाह 20 से 25 लाख रुपये का घाटा और आरोपियों को मोटा मुनाफा हो रहा था।