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सड़क पार करने में डर लगता है

भारत में सड़क पर मरने वाले लोग दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। यह आंकड़ा सालाना औसतन डेढ़ लाख का है। इनमें से 74,000 की उम्र 15 से 25 बरस के बीच है।

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Karan Thapar

सडक़ पार करने में डर लगता है

करन थापर

वरिष्ठ पत्रकार और टीवी शख्सियत

ईमानदारी से कहूं तो मुझे सड़क पार करना पसंद नहीं है। जब कभी सड़क पार करनी होती है, मैं संशय में होता हूं। अक्सर मैं इसके लिए ज़ेब्रा या पेलिकन क्रांसिंग का ही सहारा लेता हूं। बावजूद इसके मैं दाएं और बाएं देखना नहीं भूलता। कहने वाली बात नहीं कि मैं रास्ता पार करने में कोई लापरवाही नहीं बरतता।

अब जाकर मुझे कुछ ऐसी बातें सिलसिलेवार पता चली हैं जिससे सिद्ध होता है कि कुछ लोग इसे कायराना क्यों करार देते हैं। अव्वल तो यही कि भारत में सड़क पर मरने वाले लोग दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। यह आंकड़ा सालाना औसतन डेढ़ लाख का है। इनमें से 74,000 की उम्र 15 से 25 बरस के बीच है। मतलब कि आप जितने जवान हैं, आपके साथ खतरा भी उतना ही ज्यादा है।

इंटरनेशनल रोड फेडरेशन के भारतीय चैप्टर का मानना है कि महज दर्जन भर राज्य 80 फीसदी से ज्यादा सड़क हादसों के लिए जिम्मेदार हैं। इनमें चार राज्यों की भागीदारी अकेले 40 फीसदी है। इसका मतलब हम जानते हैं असल समस्या कहां है, भले इसके बारे में कोई कुछ नहीं कर रहा हो। सड़क हादसों से जुड़े कुछ विशिष्ट आंकड़े वाकई डराने वाले हैं। मसलन, 2017 में तकरीबन हर दिन दस लोगों की जान खुले गड्डे के कारण होने वाले सड़क हादसे में गई। यह एक साल पहले के मुकाबले 50 फीसदी का इजाफा था। ऐसी कुल मौतें 2017 में 3,597 थीं। इसके मुकाबले आतंकी गतिविधियों में 803 जानें गईं थीं, जिसमें नक्सल हमले भी शामिल हैं। मारे जाने वालों में आतंकवादी, सुरक्षाबल और आम नागरिक हैं।

खुले गड्ढों के कारण होने वाली मौतों में उत्तर प्रदेश अव्वल है, लेकिन हरियाणा और गुजरात जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों का भी हाल बहुत बुरा है। दिल्ली में 2017 में ऐसी आठ मौतें हुईं। संयोग से उसके पहले साल में ऐसी एक भी मौत नहीं हुई थी। इसका मतलब कि हालात बदतर हो रहे हैं। पैदल यात्री सबसे ज्यादा जोखिम में हैं, इसका पता ऐसे चलता है कि 2014 में सड़क पर मारे गए राहगीरों की संख्या 12,330 थी जो 2017 में बढकऱ 20,457 हो गई। यह करीब 66 फीसदी का इजाफा है।

इसका मतलब यह निकलता है कि देश में रोजाना 56 पैदल यात्री सड़क हादसों में मारे गए। इसमें यदि दुपहिया वाहन और साइकिल से चलने वालों को जोड़ लिया जाए, जो कि रोज़ ही मारे जाते हैं- दैनिक औसत 134 दुपहिया चालक और 10 साइकिल चालक का है- तो आप पाएंगे कि पैदल यात्रियों को मिलाकर इन तीनों श्रेणियों में पिछले साल आधे से ज्यादा मौतें हुई हैं। इसीलिए बहुत से लोग सडक़ पर चलते हुए असुरक्षित महसूस करते हैं और इसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए। कई जगहों पर तो पैदल यात्रियों के लिए बने रास्ते ही गायब हो गए हैं। या तो उन पर दुकानों या पार्किंग का अतिक्रमण हो चुका है या फिर उनमें खतरनाक गड्ढे हो गए हैं। कई तो मौत का कुआं हैं।

इसके बावजूद ज्यादातर भारतीयों को बसों और कारों में चलने के बजाय ज्यादा वक्त सड़क पर पैदल चलने में लगाना चाहिए। अक्सर इसकी उपेक्षा की जाती है। इससे आप वैसे भी बच नहीं सकते। इसके दो निराशाजनक नतीजे निकलते हैं। हर बार जब हम ऐसा करते हैं तो दरअसल अपनी जान को जोखिम में डाल रहे होते हैं। दूसरे, सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह कितनी सहज बात है।

सरकार निष्कर्षों पर ध्यान न दे, लेकिन वह अपने खिलाफ हो रहे प्रचार से आंखें नहीं मूंदे रह सकती। फिर भी यह मुद्दा किसी भी प्रशासन के लिए प्राथमिक होना चाहिए, चाहे वह केंद्र की सरकार हो अथवा हमारे 29 राज्यों मे से कोई सरकार। ज़रूरी है कि पहले सवाल पूछे जाएं क्योंकि सवाल के भीतर ही इस समस्या का जवाब छुपा है।