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उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जरूरी है स्वायत्तता

अध्यापकों, कुलपतियों तथा आवश्यक संसाधनों के अभाव से जूझती उच्च-शिक्षा व्यवस्था में ज्ञान-सृजन कैसे संभव है।शोध कार्य बंधे-बंधाए ढर्रे पर चल रहे हैं।

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उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जरूरी है स्वायत्तता

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जरूरी है स्वायत्तता

गिरीश्वर मिश्र, (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि)

स्वतंत्र होने के बाद एक नए भारत के निर्माण में उच्च शिक्षा की अहम भूमिका सोची गई, क्योंकि वह विभिन्न क्षेत्रों में प्रौढ़ जनों को जोड़ती है। शिक्षण और अनुसंधान द्वारा उच्च शिक्षा का क्षेत्र ज्ञान-निर्माण, उसकी समीक्षा और उसके प्रसार से जुड़ा हुआ है। इसमें गुणवत्ता भी चाहिए और इसे सर्वसमावेशी भी होना चाहिए। प्राचीन भारत में विश्वविद्यालय की अपने ढंग की व्यवस्था थी, पर आज की व्यवस्था का मूल अंग्रेजों द्वारा लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज पर 1857 में स्थापित कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास के विश्वविद्यालयों में है। पश्चिमी ज्ञान और विश्व-दृष्टि के सांचे में ढले ये संस्थान एक खास दृष्टि से ज्ञान-सृजन से जुड़े थे, जिसका औपनिवेशिक संदर्भ महत्त्वपूर्ण था। राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों ने इसका प्रतिकार तो किया, परन्तु अंतत: वर्चस्व पश्चिमी दृष्टि का ही बना। इनकी संख्या 1947 में 18 हो गई, जो आज केंद्रीय, राज्य सरकार से अनुदानित और निजी संस्थाओं को मिलाकर लगभग एक हजार के करीब हो चुकी है। मात्रात्मक दृष्टि से यह बड़ी उपलब्धि है, परन्तु युवा-प्रधान जनसंख्या के लिए यह अपर्याप्त है।

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आइआइएम, आइआइटी और वैसे ही कुछ और ज्ञान-द्वीपों को छोड़ दिया जाए, तो स्थिति चिंताजनक है। अधिकतर संस्थाओं में पठन-पाठन की गुणवत्ता, व्यवस्था और ज्ञान-सृजन को लेकर असंतोष व्याप्त है। सभी संस्थान बड़े दबाव में हैं। अकादमिक जीवन में नकारात्मकता के अनुभव बढ़ते जा रहे हैं। शोध कार्य में एक बंधे-बंधाए ढर्रे पर काम करते जाने के माहौल में कुछ नए ढंग से सोचने और करने की गुंजाइश घटती जा रही है। नियम-कानून की बंदिशें शोध को रूटीन में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। अक्सर शोध और प्रकाशन के तौर तरीकों के संकुचित वैज्ञानिक नजरिए के प्रति अतिरिक्त आग्रह ज्ञान के प्रति दमनात्मक रवैया बन जाता है।

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ज्ञान-विज्ञान के लिए संवाद जरूरी है। नियम और व्यवस्था का शिकंजा विचारों या चिंतन में ताजगी लाने के लिए जरूरी बौद्धिक कोशिशों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ता। लक्ष्य उच्च शिक्षा को वह मंच बनाना था, जो अनुभव को अर्थ देने या समझ विकसित करने में मददगार होता। सिर्फ डिग्री दे देने से कोई व्यक्ति किसी अनपढ़ व्यक्ति से ज्यादा काबिल नहीं हो जाता। उच्च शिक्षा मुक्त करने के लिए है या होनी चाहिए, पर हो यह रहा है कि उच्च शिक्षा से जुड़े लोग नियमों से ज्यादा प्रतिबद्ध होते जा रहे हैं। वे नई दृष्टि या संभावना की तलाश से नहीं जुड़ पा रहे हैं। उच्च शिक्षा के लिए अब उत्पादकता और व्यावहारिक उपयोगिता का रवैया खास हो गया है। ज्ञान-निर्माण को बाजारू वस्तु मानने वाला नजरिया ठीक नहीं है।

विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है और ज्ञान-निर्माण के लिए संसाधन सिकुड़ते जा रहे हैं। 'उच्च शिक्षा समाज के लिए योगदान करे, इस विचार के चलते ये संस्थान विशिष्ट क्षेत्रों में ऐसे विशेषज्ञों की जमात खड़ी करने के काम में लगे हैं, जिनके पास प्रमाणपत्र हैं। डिग्री और डिप्लोमा धारकों की संख्या ही उच्च शिक्षा का मानदंड माना जा रहा है।

ज्ञान की खोज और दुनिया की समझ की दृष्टि के लिए शिक्षण के पक्के इंतजाम नाकाफी हैं। अब पेटेंट के लिए उपयुक्त ज्ञान पर बल दिया जा रहा है। वित्तीय संसाधनों की बढ़ती कटौती के बीच स्ववित्तपोषित तरीकों को अपनाने के साथ ज्ञानार्जन की संभावना घटती जा रही है। सालों-साल अध्यापकों, कुलपतियों तथा आवश्यक संसाधनों के अभाव से जूझती उच्च-शिक्षा की उचित स्वायत्तता को स्थान दिए बिना वास्तव में ज्ञान-सृजन संभव नहीं है। नई शिक्षा नीति भारत केन्द्रित और वैश्विक दृष्टि से संपन्न है। ज्ञानमूलक लचीली शिक्षा-व्यवस्था से हालात बदल सकते हैं, बशर्ते उस पर अमल भी हो।