
विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक-2025 के अनुसार लैंगिक समानता में भारत 64.1त्न स्कोर के साथ 148 देशों में 131वें स्थान पर है जो पिछले वर्ष की तुलना में दो स्थान नीचे है। रिपोर्ट में भारत की शैक्षणिक उपलब्धि, स्वास्थ्य और जीवनयापन में सुधार पर प्रकाश डाला गया है, लेकिन राजनीतिक सशक्तीकरण में गिरावट और आर्थिक भागीदारी में लगातार चुनौतियों को दर्शाया गया है।
सवाल यह उठता है कि क्या महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर आर्थिक स्तर पर पहुंच पाएंगी, क्या कभी महिलाओं के घरेलू काम-काज, बच्चों की देखभाल जैसे कार्यों को आर्थिक गतिविधियों की श्रेणी में देखा जाएगा, और क्या पुरुष उन्हें मानसिक बोझ को बांटने में बराबरी कर पाएंगे। इन सवालों पर दशकों से चर्चा होती रही है फिर भी प्रत्येक समाज में प्रत्येक युग में लैंगिक भिन्नता बनी हुई है। इस दिशा में ऐसा क्या किया जाए जो सदियों से चली आ रही लैंगिक भिन्नता समाप्त हो जाए। हाल ही में प्रकाशित दो समाजशास्त्रियों कॉर्डेलिया फाइन की Patriarchy Inc. और एलिसन डैमिंगर की What’s on Her Mind नामक पुस्तकें इन पक्षों को नए दृष्टिकोण से देखने और समाधान निकालने का सुझाव देती हैं।
कॉर्डेलिया फाइन तर्क देती हैं कि कार्यस्थल में लैंगिक असमानता एक संरचनात्मक घटना है, न कि कोई व्यक्तिगत मुद्दा। उनका तर्क है कि महिला एवं पुरुष के बीच यह असमानता जन्मजात भिन्नता के कारण नहीं है बल्कि उस व्यवस्था के प्रति एक तार्किक प्रतिक्रिया है जो महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण करियर और पारिवारिक जीवन में संतुलन बनाना मुश्किल कर देती है। वहीं एलिसन डैमिंगर तर्क देती हैं कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक संज्ञानात्मक श्रम करती हैं। संज्ञानात्मक श्रम से तात्पर्य योजना बनाने, संगठित करने, प्रबंधन करने और समस्या-समाधान करने के अदृश्य मानसिक प्रयास से है, जो शारीरिक कार्यों से अलग है। इसमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से घरेलू कार्य, बच्चों की देखभाल और रिश्तों के लिए आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाना, निर्णय लेना और परिणामों की निगरानी करना शामिल है और इस तरह के कार्यों का भार अक्सर महिलाओं पर पड़ता है, जिससे उनमें संभावित तनाव बढ़ जाता है।
इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों का मानसिक कार्यभार असमान रूप से वहन करती हैं। खाना बनाना, बर्तन धोना, घर को व्यवस्थित करना, साफ-सफाई करना, महिलाओं का ही मुद्दा क्यों माना जाता है? क्यों उन्हें इन कामों को इनमें अंतर्निहित मूल्यों के अनुसार मूल्यांकित नहीं किया जाता। आज बड़ी संख्या में महिलाएं वेतनभोगी या आर्थिक इकाई के रूप में अपना योगदान कर रही हैं फिर भी वे परिवार का ज्यादातर मानसिक बोझ उठाती हैं।
यह भी एक तथ्य है कि स्त्रियों को उनकी कमजोर बुद्धि का बहाना बनाकर अधिकारों से वंचित करने की मंशा सभी समाजों का यथार्थ रहा है। लिंग के आधार पर श्रम का विभाजन लैंगिक भेदभाव का ही एक उदाहरण है। नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ का कथन है कि एक महिला के रूप में मेरा कोई देश नहीं है, एक महिला के रूप में मैं कोई देश चाहती भी नहीं हूं, एक महिला के रूप में समूचा विश्व ही मेरा देश है। जिस दिन लोगों की मानसिकता में लैंगिक असमानता समाप्त हो जाएगी, उस दिन एक समावेशी और स्वतंत्र समाज/देश का निर्माण आकार ले सकेगा।
Published on:
20 Sept 2025 05:10 pm
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