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कितने मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के खिलाफ कितनी ही जांचें हो चुकी लेकिन नतीजा आज तक कुछ नहीं निकला। देश में छाए भ्रष्टाचार के कुंहासे के बीच कभी-कभी चमकने और गरजने वाली बिजली भ्रष्टाचार मुक्त भारत की धुंधली-सी उम्मीद जगाती है। ऐसी ही उम्मीद दो दर्जन विधायकों के आयकर जांच के दायरे में आने से जगी है।
रोजगार के स्थायी साधन नहीं होने के बावजूद साल-दर-साल उनकी सम्पत्ति कैसे बढ़ती जाती है? कितने मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के खिलाफ कितनी ही जांचें हो चुकी लेकिन नतीजा आज तक कुछ नहीं निकला।
सत्तर सालों में यह पहला मौका है जब विधायकों की अप्रत्याशित रूप से सम्पत्ति बढऩे के मामले में आयकर विभाग सख्त हुआ है। विधायकों पर आरोप सही पाए गए तो उन पर तीन सौ फीसदी जुर्माना के साथ उनकी सदस्यता भी जा सकती है। बिहार के इन दो दर्जन विधायकों की सदस्यता क्या समाप्त हो जाएगी? यह कहना बहुत मुश्किल है। हर सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का प्रयास करती है लेकिन जमीनी हकीकत सबके सामने है।
बिहार ही क्यों, देश के किसी भी राज्य के सांसद-विधायकों की सम्पत्ति की जांच ईमानदारी के साथ कर ली जाए तो बिहार जैसे ही परिणाम सामने आएंगे। अधिकांश जनप्रतिनिधि अपने आपको समाज सेवा से जुड़ा बताते हैं। रोजगार के स्थायी साधन नहीं होने के बावजूद साल-दर-साल उनकी सम्पत्ति कैसे बढ़ती जाती है? कितने मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के खिलाफ कितनी ही जांचें हो चुकी लेकिन नतीजा आज तक कुछ नहीं निकला। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकांश राजनेताओं-अधिकारियों का बाल भी बांका नहीं होता।
सीबीआई, आयकर विभाग अथवा प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई अपने अंजाम तक पहुंच ही नहीं पाती। कोई डरे तो क्यों? गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स और इस जैसे कुछ संगठन धन्यवाद के पात्र हैं जो राजनेताओं की बढ़ती सम्पत्ति के आंकड़े ढूंढ़-ढूंढ़ कर निकालते रहते हैं। वर्ना तो किसे फुरसत पड़ी है किसी के बैंक खातों में झांकने की।

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