संत विनोबा ने आपातकाल को अनुशासन पर्व कहा था। इसलिए नहीं कि आपातकाल लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक था पर कुछ महीनों के लिए ही सही उन दिनों रेल समय पर चलने लगी थी, दफ्तरों में बाबू,अफसर समय पर पहुंचते थे। अस्पतालों में डॉक्टर सीट पर मिल जाते थे। पटवारी ने रिश्वत लेना कम कर दिया था।
खामखां की हड़तालें बंद हो गई थीं। बीमा विभाग में काम करने वाले पंडित जी साढ़े बारह बजे से पहले कभी कार्यालय नहीं पहुंचते थे और शाम चार बजे बाद नदारद हो जाते थे, वे श्रीमान ठीक दस बजे दफ्तर हाजिर और शाम छह बजे तक कुर्सी पर डटे रहते। वह डंडा अनुशासन का था। लेकिन जैसे ही इस अनुशासन से उकतायी जनता ने कांग्रेस को पटखनी दी और जनता पार्टी का राज आया तो देश में अनुशासनहीनता छा गई जो अभी तक जारी है।
बुरा न मानें अनुशासनहीनता हमारे स्वभाव में है। घर में देख लीजिए। बेचारी गृहिणी बच्चों और बींद को टोकती रहती है कि अपनी चीजों को व्यवस्थित रखो लेकिन सुनता कौन है। रजाई में घुसे-घुसे धणी चाय की डिमाण्ड करते रहते हैं एन दफ्तर के वक्त ऐसी आपा-धापी मचाते हैं जैसे बौर्डर पर लड़ने जाना है।
छात्रों में अनुशासनहीनता ऐसे समा गई है जैसे जलेबी में चाशनी। बेचारे गुरुजी रोज दिन गली के नुक्कड़ वाले बाला जी को ढोक कर स्कूल जाते हैं- हे संकटमोचन आज इज्जत रख देना। विश्वविद्यालय के लेक्चरर रिटायर होने पर मंदिर में सवामणी करते हैं-चलो बाइज्जत नौकरी पूरी हो गई। अनुशासन की सबसे ज्यादा चर्चा राजनीति में है। संगठन चलाने वाले नेता बार-बार कार्यकर्ताओं और असंतुष्टों को अनुशासन के शेर से डराते रहते हैं। मजे की बात यह कि डराने वाला और डरने वाला दोनों जानते हैं कि इस शेर में भूसा भरा है।
पिछले दिनों शहर में कई आयोजन हुए। एक असंतुष्टों ने किया और दूसरा संतुष्ट धड़े ने। असंतुष्ट ने दिवंगत नेता को और संतुष्ट ने जीवित नेता को याद किया। मजे की बात यह कि असंतुष्टों का कार्यक्रम 'हिटÓ रहा। अब संतुष्टों की तरफ से अनुशासन चालीसा का पाठ हो रहा है। चाहे पुराने ऋ षि मुनि हों या आधुनिक प्रबन्धशास्त्री। प्राचीनग्रंथ हो या प्रबन्ध पुस्तकें सभी में अनुशासन के गुण गाए गए हैं लेकिन इस पर अमल कितने लोग करते हैं। लोग तो डॉक्टर की चेतावनी को भी तोड़ने से बाज नहीं आते चाहे जान के लाले ही क्यों न पड़ जाए। जो आज अनुशासन तोड़ता है कल वही औरों को सीख देने लगता है।
राही