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आपदा प्रबंधन और नियोजन

पांच हजार बांधों में से अभी तक केवल दो सौ बांधों के लिए ही कुछ राज्यों ने आपातकालीन कार्ययोजना तैयार की है। तीस के करीब जलाशयों और बैराजों के लिए ही इनफ्लो पूर्वानुमान उपलब्ध है।

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Sunil Sharma

Sep 03, 2018

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- वरुण गांधी, सांसद

अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच अनूठी भौगोलिक बनावट द्ग तटवर्ती मैदान और बेलनाकार पहाडिय़ां द्ग वाला राज्य केरल कई आसन्न प्राकृतिक खतरों से घिरा हुआ है, जिनमें भूस्खलन, बाढ़ और तटीय क्षरण सबसे आम हैं। इंसानी दखल के चलते खासकर बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। हालिया जलप्रलय से 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं, जो तीन हजार से ज्यादा राहत शिविरों में रह रहे हैं। बाढ़ से 21,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

माधव गाडगिल की अगुवाई वाले पश्चिमी घाट विशेषज्ञ पारिस्थितिकी पैनल ने पश्चिमी घाट में करीब 14 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तीन पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र बनाने की सिफारिश की थी और इनमें निर्माण व खनन गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिए जाने को कहा था। राज्य सरकार ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया।

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने को विकसित राज्य भी कुछ नहीं कर रहे हैं द्ग गृह मंत्रालय ने अप्रेल 2003 में सीआइएसएफ और आइटीबीपी से चार बटालियनों को अलग करके विशेषज्ञ टीमें बनाने का प्रस्ताव दिया था, साथ ही केरल को एक राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान और पुलिस स्तर की बटालियनों की पहचान करने को कहा था। लेकिन केरल पंद्रह साल बीत जाने पर भी इस प्रस्ताव पर आगे बढक़र विशेषज्ञ टीमों का गठन करने में नाकाम रहा है। बीते साल के ओखी तूफान के बाद 600 से अधिक सदस्यों वाली एक विशेष टीम बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पहले चरण में 30 करोड़ रुपए की मंजूरी के साथ दिया गया प्रस्ताव भी राज्य सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहा है।

केरल में अच्छे काम के बावजूद हकीकत यह है कि नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स की क्षमता प्रशिक्षित मैनपावर, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और उपकरणों की कमी से बाधित है। सीएजी ने भी कहा है, प्रमुख शहरों के लिए जोखिम मूल्यांकन और समाधान जैसी परियोजनाओं को लेकर एनडीएमए का प्रदर्शन ‘बुरे हाल’ में है।

भारत प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है, पर रिस्क मैनेजमेंट अभी शुरुआती अवस्था में ही है। हम आपदाओं की भविष्यवाणी कर पाने में भी बहुत पीछे हैं। नेपाल के भूकंप को भारत की भूकंप चेतावनी प्रणाली एक्सेलेरोग्राफ ने बमुश्किल ही दर्ज किया। नेशनल सीसमोलॉजी सेंटर को भी फंड में कटौती और लालफीताशाही की वजह से नए सेटअप में स्थानांतरित करने में देरी हुई। केदारनाथ त्रासदी के सालों बाद आज भी उत्तराखंड में शायद ही चंद डॉपलर राडार होंगे जो बादल फटने और भारी बारिश पर अलर्ट (तीन से छह घंटे पहले) देते हैं।

पर्याप्त संख्या में हेलीपैड तो जाने दीजिए, सुरक्षित क्षेत्रों के नक्शे या बाढ़ संभावित क्षेत्रों में निर्माण के बारे में दिशा-निर्देश भी मुश्किल से मिलते हैं। पहाड़ों में बड़े बांध मंजूर किए जाते हैं और नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) खामोश रहती है। देश के पांच हजार बांधों में से अभी तक केवल दो सौ बांधों के लिए ही कुछ राज्यों ने आपातकालीन कार्ययोजना तैयार की है। तीस के करीब जलाशयों और बैराजों के लिए ही इनफ्लो पूर्वानुमान उपलब्ध है। वेधशाला नेटवर्क के अपग्रेडेशन के लिए शायद ही कभी परियोजना शुरू हुई।

देश में आपदा राहत के मानदंडों में भी बदलाव की जरूरत है द्ग हर राज्य और जिले में श्रम और निर्माण की लागत अलग-अलग होती है, जिससे राहत की एक समान राशि का वितरण सही नहीं है। आमतौर पर, आपदा के बाद राजस्व अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने और राहत के वास्ते लोगों की पहचान के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में सहायता राशि के दुरुपयोग और अनधिकृत क्षेत्र में रहने वाले किसी भी शख्स के राहत से वंचित रहने की आशंका बनी रहती है।

दूसरी ओर, नियोजित तरीके से बसाए गए शहर आपदाओं का सामना कर सकते हैं द्ग जापान इसका बेहतरीन उदाहरण है। जबकि भारत की शहरी इमारतों में फौरन रेट्रोफिटिंग यानी नई परिस्थितियों के मद्देनजर पुराने भवनों के पुन:संयोजन की जरूरत है। रूडक़ी समेत चंद विश्वविद्यालयों में ही भूकंप इंजीनियरिंग को विशेषज्ञ कोर्स के रूप में पढ़ाया जाता है, जिससे रेट्रोफिटिंग के लिए प्रशिक्षित सिविल इंजीनियरिंग मैनपावर की भारी कमी बनी हुई है।

इंडिया डिजास्टर रिसोर्स नेटवर्क को सूचना और उपकरण जुटाने के लिए संस्थागत रूप से काम करने का जिम्मा दिया जाना चाहिए। देश को एक मजबूत आपदा प्रबंधन एजेंसी की जरूरत है। आपदा से निपटने की तैयारी में तात्कालिक आकस्मिकता को पूरा करने के साथ ही इंसानी स्वभाव को समझते हुए सुविचारित दीर्घकालिक पुनर्वास रणनीति को लागू करना होगा, नागरिकों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर देना होगा और एनडीआरएफ में विशेषज्ञों के रिक्त पद भरने होंगे।

ऐसे सुधारों के अभाव में, आपदा की स्थिति में सिर्फ सेना और अर्धसैनिक बल ही सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाले बने रहेंगे और राज्य राहत का रोना रोते रहेंगे। संभवत: आपदा से आपात स्थिति पैदा होने पर उसका सामना करने के बजाय पहले से बेहतर तैयारी रखने का यही सही समय है।