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न बनें ऐसे कारण जिनसे डगमगाए युवाओं का भरोसा

लगभग प्रत्येक चुनाव में राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशी युवा मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाने में रात-दिन एक कर देते हैं। निश्चित रूप से ये प्रयास उनके लिए फायदा देने वाले भी होते हैं।

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सचिन पायलट, कांग्रेस नेता और राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री

लगभग प्रत्येक चुनाव में राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशी युवा मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाने में रात-दिन एक कर देते हैं। निश्चित रूप से ये प्रयास उनके लिए फायदा देने वाले भी होते हैं। राजनीतिक दलों और राजनीतिक लोगों की भी सबसे ज्यादा कोशिश युवाओं का समर्थन हासिल करने की रहती है। इसके लिए युवाओं से वादे भी किए जाते हैं पर सत्ता पाने के बाद इनको भुला दिया जाता है। राजनीति से जुड़े लोगों के लिए भी अब यह वक्त आ गया है जब वे अपने संकल्पों को उपलब्धियों में बदलें।

वर्ष 2014 का आम चुनाव आशाजनक संकेत लिए था जब कुल 66 फीसदी मतदान हुआ। मतदान करने वालों में भी 68 फीसदी युवा थे। तब तक यह माना जाता था कि कुल औसत मतदान की तुलना में युवा 3 से 5 फीसदी कम मतदान करते हैं। लेकिन दस साल बाद यानी इसी साल वर्ष 2024 के आम चुनावों में 1.8 करोड़ युवा पहली बार मतदाता बने। हालांकि चुनाव आयोग के अनुसार नए पात्र मतदाताओं में से बमुश्किल 40 प्रतिशत ने ही मतदाता के रूप में पंजीकरण कराया। यह सचमुच चिंता का विषय है। अगर हम युवा वोटर्स को चुनावी प्रक्रियाओं में पूरी तरह हिस्सेदार नहीं बना सके तो यह हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए कैंसर की तरह साबित होगा।

ऐसे में जरूरत कुछ तात्कालिक कदम उठाने की है - (अ) सत्ता और संगठन में मुख्यधारा के नेतृत्व वाले पदों पर युवाओं को लाना होगा, (ब) पेपर लीक होने से रोकने के लिए जो भी करना पड़े, वह करना होगा, (स) अवसाद के कारण छात्रों की आत्महत्या की प्रवृत्ति से संबंधित समस्या का समाधान करने के लिए पूरे समाज को योगदान देना होगा, और (द) नौकरियों के अवसर शीघ्र प्रदान करने होंगे, कहीं बहुत देर न हो जाए।

सबसे पहले हमें जो करना चाहिए वह है - राजनीतिक ताने-बाने में युवा नेताओं के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना। युवा प्रतिनिधित्व की असली कसौटी वह प्रतिनिधित्व है जो पार्टी के युवा या छात्र इकाई के बाहर युवाओं को मिल पाता है। युवाओं की भूमिका केवल वाहन बाइक रैली या बैनर, पोस्टर और नारे लगाने तक ही सीमित नहीं है। सही मायने में उनको ऐसा अवसर देना होगा जिसमें हम उनके नेतृत्व को स्वीकार करने के साथ उनकी भावनाओं से भी सहमत हो सकें।

मेरी नजर में सबसे घृणित अपराध किसी व्यक्ति का पेपर लीक घटनाओं में लिप्त होना है। बेरोजगारी और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के बीच नौकरियों की चयन प्रक्रिया में सेंध लगाना उन युवाओं के लिए झटका है जो इन परीक्षाओं की तैयारियों में अपना काफी समय खपा देते हैं। परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में शुचिता तय करने में लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाएं भी मजाक बन कर रह गई हैं।

केन्द्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 अधिसूचित किया है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि व्यापक स्तर पर पेपर लीक और भ्रष्टाचार सिर्फ सेवा प्रदाता के जरिए नहीं हो सकता। सार्वजनिक परीक्षा प्राधिकरण से जुड़े सदस्यों की संलिप्तता के बिना ऐसा संभव नहीं। ऐसे मामलों में निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों की मिलीभगत भी रहती है। ऐसे में नकल व पेपर लीक की रोकथाम के लिए सामूहिक रूप से समूची प्रक्रिया सुरक्षित बनानी होगी। अपराधों की अधिकतम सजा आजीवन कारावास तक करनी होगी।

उन सबको कानून के दायरे में लाना चाहिए जो परीक्षाओं के आयोजन के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। आर्थिक दंड भी व्यापक होना चाहिए। यह सेवा प्रदाताओं के वार्षिक राजस्व का एक गुणक या परीक्षा के आवेदन शुल्क के एक अनुपात में हो सकता है। अनुचित साधनों के खिलाफ यह पहला कानून नहीं है। यह कानून भी इस बुराई से छुटकारा तब तक नहीं दिलाएगा जब तक कि समूचे सिस्टम में सार्थक बदलाव नहीं होगा।

भारत में आत्महत्याओं के आंकड़ों में चिंताजनक बिन्दु तो यह है कि इनमें 41 फीसदी युवा ऐसे हैं जिनकी उम्र 30 वर्ष से कम थी। वर्ष 2022 में 2,095 युवाओं ने परीक्षाओं में असफल होने के कारण आत्महत्या की। किसी भी रोजगार या शिक्षा का मूल्य जीवन से बढ़कर तो नहीं है। इस समस्या का एक झटके में कोई समाधान भी नहीं है। लेकिन सामाजिक आउटरीच शुरू कर घरों में डिनर टेबलों पर इस मुद्दे पर चर्चा को अहमियत दी जानी चाहिए। ऐसा माहौल उत्पन्न करना चाहिए जिससे उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ स्थायी विकल्प भी तैयार हों।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की भारत रोजगार रिपोर्ट 2024 के अनुसार, देश के कुल बेरोजगारों में लगभग 83 प्रतिशत युवा हैं। वर्ष 2030 तक, भारत को नए गैर-कृषि क्षेत्र में कम से कम 9 करोड़ नौकरियां उत्पन्न करने की जरूरत है अगर 5.5 करोड़ अतिरिक्त महिलाएं कार्यबल में शामिल होती हैं तो नौकरियों की मांग और बढ़ जाएगी।

पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक यह संदर्भ न हो कि यह ढांचा रोजगार पैदा करने वाला है या बेरोजगारी में इजाफा करने वाला। सरकार वाकई में इस मुद्दे का समाधान करना चाहती है तो उसे प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। रोजगार सृजन के मुद्दे पर विफलता से हमारी राजनीतिक और गवर्नेंस प्रणालियों में युवाओं का भरोसा तो डगमगाता ही है, हमारे सामाजिक सरोकार सुनिश्चित करने के उपायों की सफलता भी खतरे में पड़ जाती है।