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बढ़ते वैवाहिक खर्च रोकने के लिए बने कानून

वैवाहिक खर्च के जरिए प्रतिष्ठा के लिए ही गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार का मुखिया सभी दांव-पेच अपनाता है और भ्रष्ट आचरण के लिए मजबूर हो जाता है।
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Sunil Sharma

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Updated: 31 Oct 2017, 3:36 PM IST

shahdol

marrige muhurat

- नमामी शंकर बिस्सा, टिप्पणीकार

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में विवाह महत्वपूर्ण संस्कार है लेकिन देखने में आ रहा है कि लोग इस सादगीपूर्ण संस्कार को अत्यधिक खर्चीला बनाते जा रहे हैं। अस्सी के दशक से पूर्व तक केवल धनाढ्य वर्ग ही शादियों में मोटी रकम खर्च करना अपनी प्रतिष्ठा समझता था। जब आर्थिक सुधारों एवं उदारवाद का युग शुरू हुआ तो गरीब वर्ग मध्यम और मध्यम वर्ग धीरे-धीरे उच्च मध्यम की श्रेणी में आ गया। इस आर्थिक बदलाव के साथ ही सभी सामाजिक वर्गों पर महंगी शादियां करने का दबाव बढऩे लगा। नब्बे के दशक के बाद विवाह संस्कार, समारोह का कारोबार बना दिया गया। आज इसका वार्षिक टर्नओवर करीब एक लाख करोड़ रुपए है। इसके आयोजन में फिजूलखर्ची और दिखावा सामाजिक प्रतिष्ठा के पैमाने बन गए।

इस प्रतिष्ठा के लिए ही गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार का मुखिया सभी दांव-पेच अपनाता है और भ्रष्ट आचरण के लिए मजबूर हो जाता है अथवा ऋण के बोझ तले दबने को विवश हो जाता है। दिखावे के लिए उसे संपत्ति बेच कर या गिरवी रख कर यह खर्चा वहन करना पड़ता है। यद्यपि यह सामाजिक सुधार का मुद्दा है किन्तु दिनों-दिन बढ़ रही इसकी भयावहता देखते हुए इसकी रोकथाम के लिए दहेज विरोधी कानून की तर्ज पर ही एक सख्त कानून की आवश्यकता है। यद्यपि कानून होने पर भी दहेज लेन-देन सौ फीसदी बंद नहीं हो सका है किन्तु इसके विरुद्ध कानून के बनने से महिलाओं पर दबाव व उनका त्पीडऩ तो नि:सन्देह कम हुआ ही है। संसद और विधानसभाओं में इस मुद्दे पर चिंता जरूर व्यक्त की जाती है लेकिन गंभीर पहल कभी नहीं हुई है।

वर्ष 1996 में सरोज खापर्डे और 2005 में रायापति संबाशिव राव ने भी राज्यसभा में तथा इसी वर्ष प्रेमा करियप्पा ने भी राज्यसभा में ही निजी विधेयक लाकर इस सामाजिक बुराई के विरुद्ध बिगुल बजाया। वर्ष 2011 में पी.जे. कुरियन तथा महेन्द्र चौहान ने लोकसभा में निजी विधेयक प्रस्तुत किये। इस वर्ष 2017 के प्रारम्भ में लोकसभा सांसद रंजीत रंजन ने ‘‘मेरिज (कम्पलसरी रजिस्ट्रेशन एण्ड प्रिवेंशन ऑफ वेस्टफुल एक्सपेंडिचर) बिल 2016’’ प्रस्तुत किया। इन सभी निजी विधेयकों में शादी में होने वाले खर्चों की अधिकतम सीमा तय करने एवं सादगी की बात पर बल दिया है। इनमें से ज्यादातर ‘लेप्स’ हो गए हैं। विवाहों में फिजूलखर्ची रोकने के लिए यदि सरकारें इसे सामाजिक मुद्दा मानकर सख्त कानून नहीं बनाती है तो यह बुराई शीघ्र ही अभिशाप बन कर विवाह जैसे पवित्र संस्कार की जड़ों को खोखला कर देगी।