
8 सितंबर तक मनाया जाएगा नेत्रदान पखवाड़ा
डॉ. सुरेश पाण्डेय
चिकित्सक और कई पुस्तकों के लेखक
आंखों के अभाव में जीवन कितना मुश्किल हो सकता है इसकी कल्पना हम कुछ मिनट अपनी आंखें बंद करके कर सकते हैं। व्यक्ति की आंखें न केवल जीवनभर उसे रोशनी देती हैं वरन मरने के बाद किसी और की जिंदगी का अंधेरा भी दूर कर सकती हैं। यह अंधेरा कैसे मिटाया जा सकता है इस सवाल का जवाब भी हमारे पास ही है। हमारे शास्त्रों में दान की महिमा का खूब जिक्र है। यह भी कथानक सबको पता है कि किस तरह से महर्षि दधीचि ने जनहित में अपनी अस्थियां दान में दे दी थीं। नेत्रदान के जरिए ही उन लोगों के जीवन में रोशनी लाई जा सकती है जिन्हें अंधेरा अभिशाप के रूप में मिला है। कॉर्निया खराबी के कारण हुई अंधता से ग्रसित व्यक्तियों के लिए नेत्रदान वरदान है। समाज में नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाकर भारत नेत्रदान के क्षेत्र में एक सम्मानजनक मुकाम पर पहुंच सकता है। यदि सभी मृत व्यक्तियों द्वारा नेत्रदान किया जाए तो देश में कोई भी कॉर्निया में खराबी होने के कारण हुई अंधता से ग्रसित नहीं होगा। देश भर में हर साल 25 अगस्त से 8 सितम्बर तक मनाए जाने वाले नेत्रदान पखवाड़े का मकसद भी यही है कि लोगों में नेत्रदान से जुड़ी भ्रांतियां दूर की जाएं।
मोटे अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 1 करोड़ 80 लाख व्यक्ति अंधता के अभिशाप से ग्रसित है। देश में अंधता/दृष्टिबाधिता के पांच प्रमुख कारण मोतियाबिंद, कालापानी, दृष्टिदोष, रेटिना (पर्दे) की बीमारियां एवं आंख की पारदर्शी पुतली (कॉर्निया) में होने वाले रोग हैं। भारत में कुल अंधता का लगभग एक फीसदी कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के कारण है। देश भर में एक लाख बीस हजार लोगों की दोनों आंखों का कॉर्निया अंधता की स्थिति तक खराब है। वहीं लगभग दस लाख लोगों की दोनों आंखों का कॉर्निया प्रभावित होने के करण उन्हें कम दिखता है। लगभग 68 लाख लोगों का एक कॉर्निया प्रभावित है। चिंता की बात यह है कि हर साल 25-30 हजार लोग कॉर्निया खराब होने के कारण अंधता से ग्रसित हो रहे है। ये आंकड़े चिंताजनक जरूर हैं पर एक तथ्य यह भी है कि इन सब में से लगभग 50 प्रतिशत लोग कॉर्नियल ट्रांसप्लांट (पारदर्शी पुतली का प्रत्यारोपण) के जरिए खोई हुई रोशनी वापस प्राप्त कर सकते है। इसके लिए हर वर्ष कम से कम एक लाख पचास हजार कॉर्निया की जरूरत रहती है पर नेत्रदान इसके मुकाबले एक तिहाई भी नहीं है। इण्डियन जरनल ऑप्थेलमॉलोजी के जून 2022 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार भारत में नेत्रहीनता की वजह से देश भर में करीब 800 करोड़ रुपए की उत्पादकता प्रभावित होती है। मृत्यु के बाद आंखों का दान करने को लेकर हमारी धार्मिक मान्यताएं भी आड़े आती हैं। मृत देह से आंखें निकालने के बाद चेहरे में विकृति आने, मधुमेह व रक्तचाप जैसी बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत आंखें काम नहीं आने व पुरुष के केवल पुरुष व महिलाओं के केवल महिलाओं की आंख लगाने जैसी भ्रांतियों को दूर किया जाना जरूरी है। इतना जरूर है कि धीरे-धीरे लोगों में नेत्रदान को लेकर जागरूकता आने लगी है और वे मृत्यु उपरांत नेत्रदान का संकल्प करने लगे हैं। सच तो यह है कि केवल व्यक्ति की मृत्यु के तुरंत बाद आंखों के कॉर्निया नामक अग्रिम पारदर्शी हिस्से को ही निकाला जाता हैं। पूरी आंख का प्रत्यारोपण दुनिया में कहीं भी संभव नहीं है। केवल कॉर्निया का ही प्रत्यारोपण किया जाता है। मरने के बाद जितनी जल्दी कॉर्निया निकाला जाए, उतना ही वह प्रत्यारोपण के लिए उत्तम रहता है।
कुछ लोग चाहते हुए भी नेत्रदान नहीं कर पाते। इसकी बड़ी वजह प्रक्रिया की जानकारी का अभाव है। नेत्रदान के बारे में जागरूकता बढ़ाकर नेत्रदान की परम्परा को आगे बढ़ाया जा सकता है। हमारे यहां कॉर्निया के दान के क्षेत्र में गुजरात, आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र सबसे आगे हैं। देश में कॉर्निया की खराबी के कारण अंधता (कॉर्नियल ब्लाइंडनेस) की गहन समस्या को देखते हुए यह जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों से मरणोपरांत नेत्रदान के संकल्प पत्र भरवाए जाएं। हादसों में अपने प्रियजनों को गंवाने वाले भी धैर्य धारण करते हुए अपने प्रियजन के नेत्रदान की दिशा में पहल करते हुए इस मुहिम को गति देने में आगे आ सकते हैं। जरूरत नेत्रदान को लेकर भ्रांतियों को दूर करने की है।
Published on:
06 Sept 2022 09:33 pm
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