16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बदलाव की उम्मीद

क्या सतपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर भेज कर केंद्र ने उद्वेलित कश्मीर घाटी में कोई नई राजनीतिक पहल की ओर कदम बढ़ाया है, इसका जवाब तो भविष्य ही देगा।

2 min read
Google source verification

image

Sunil Sharma

Aug 23, 2018

opinion,work and life,rajasthan patrika article,jammu kashmir, jammu kashmir violence

violence in jammu kashmir, jammu kashmir, riots

केंद्र सरकार ने तीन नए राज्यपाल नियुक्त किए हैं और चार मौजूदा राज्यपालों की बदली की है। इन नियुक्तियों में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में सतपाल मलिक को भेजे जाने पर सबकी निगाह गई है। समाजवादी पृष्ठभूमि के मलिक अब तक बिहार के राज्यपाल थे। यह सवाल पूछा जा सकता है कि उन्हें अलगाववादी आतंक के शिकंजे में फंसे राज्य में भेज कर क्या केंद्र सरकार वहां की समस्या को सुलझाने की कोई नई पहल करना चाहती है? पांच दशक बाद जम्मू-कश्मीर में किसी राजनेता को इस राज्य का राज्यपाल बनाया गया है।

आम तौर पर या तो सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी या सेना के रिटायर्ड अधिकारी यहां राज्यपाल बनाए जाते रहे हैं। वर्ष 1965 में जब संविधान संशोधन के जरिये जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल संस्था की व्यवस्था की गयी तब से अब तक सिर्फ पहले दो वर्षों को छोडक़र, जब जम्मू-कश्मीर रियासत के पूर्व शासक डॉ. कर्ण सिंह को राज्यपाल बनाया गया, वहां के राजभवन में सेना या प्रशासनिक अधिकारी ही तैनात रहे हैं।

राजनीति की लंबी पारी खेल चुके मलिक, रक्षा और गृह सचिव रह चुके नरेंद्र नाथ वोरा का स्थान लेंगे, जो दस वर्षों से इस पद पर थे। मलिक की नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब इस राज्य में राज्यपाल शासन लागू है और वहां का प्रशासन सीधे राज्यपाल की निगरानी में है। आज के माहौल में मलिक को जम्मू-कश्मीर भेजा जाना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उनके स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद से नजदीकी रिश्ते रहे हैं जिनकी बेटी महबूबा मुफ्ती की सरकार के गिरने के बाद से इस राज्य में राज्यपाल शासन लागू है। देखना होगा कि अनेकों पेचों में फंसे इस राज्य के हालात से निबटने के लिए केंद्र सरकार कैसी राजनीतिक पहल करती है।

संविधान में राज्यपाल संस्था बनने के साथ यदि यह अपेक्षा जगी थी कि राजभवन में ऐसे लोग, जो चुनावी राजनीति से बाहर होते हैं, बिठाए जाएंगे ताकि उनके ज्ञान और अनुभवों का लाभ राज्य को मिल सके और सरकारों के निर्वाचित प्रमुख उनसे मार्गदर्शन पा सकें, वह कभी पूरी नहीं हुई। यह संस्था चुक चुके या उम्रदराज हो चले राजनेताओं की शरणस्थली बन के रह गई या राजनीतिक दांव-पेच में किन्हीं को सक्रिय राजनीति से अलग करने का आसान राह बन गयी। हमने यह भी देखा है कि राज्यों में अपने पक्ष और विपक्ष की सरकारों के आधार पर भी वहां राज्यपाल के रूप में भेजे जाने वाले राज्यपालों के व्यक्तित्वों का चयन होता रहा है।

संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल सामान्य तौर पर राष्ट्रपति या कहें केंद्र सरकार का एजेंट ही होता है। मगर लंबी परंपरा को तोडक़र जम्मू-कश्मीर में किसी राजनेता को राज्यपाल के रूप में भेजा जाना कुछ संकेत जरूर देता है। तो क्या मलिक को वहां भेज कर केंद्र ने उद्वेलित कश्मीर घाटी में कोई नई राजनीतिक पहल की ओर कदम बढ़ाया है, इसका जवाब तो भविष्य ही देगा परंतु इतना अवश्य है कि जम्मू-कश्मीर में कोई भी राजनीतिक पहल वहां के लोगों की साझेदारी के बिना संभव नहीं है। राज्यपाल शासन के दौरान वहां राजभवन में बैठा कोई राजनेता ही यह रास्ता प्रशस्त कर सकता है।